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अग्ने॑ क॒विर्वे॒धा अ॑सि॒ होता॑ पावक॒ यक्ष्य॑: । म॒न्द्रो यजि॑ष्ठो अध्व॒रेष्वीड्यो॒ विप्रे॑भिः शुक्र॒ मन्म॑भिः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agne kavir vedhā asi hotā pāvaka yakṣyaḥ | mandro yajiṣṭho adhvareṣv īḍyo viprebhiḥ śukra manmabhiḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अग्ने॑ । क॒विः । वे॒धाः । अ॒सि॒ । होता॑ । पा॒व॒क॒ । यक्ष्यः॑ । म॒न्द्रः । यजि॑ष्ठः । अ॒ध्व॒रेषु॑ । ईड्यः॑ । विप्रे॑भिः । शु॒क्र॒ । मन्म॑ऽभिः ॥ ८.६०.३

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:60» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:32» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:7» मन्त्र:3


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'कवि व मेधा' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! आप (कविः) = क्रान्तप्रज्ञ व (वेधाः असि) = विधाता - कर्मफलानुसार सबको विविध योनियों में जन्म देनेवाले हैं। हे (पावक) = पवित्र करनेवाले प्रभो! आप (होता) = सब कुछ देनेवाले हैं, अतएव (यक्ष्यः) = पूजनीय हैं। [२] आप (मन्द्रः) = आनन्दस्वरूप व (यजिष्ठः) = अतिशयेन पूज्य हैं। (विप्रेभिः) = ज्ञानी पुरुषों के द्वारा (मन्माभिः) = मननीय स्तोत्रों से हे (शुक्र) = देदीप्यमान व पवित्र प्रभो ! आप (अध्वरेषु) = यज्ञों में (ईड्यः) = स्तुति के योग्य हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु कवि हैं, विधाता हैं। ये प्रभु ही उपासनीय हैं। ज्ञानी पुरुष मननीय स्तोत्रों के द्वारा प्रभु का उपासन करते हैं।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni is the poet of the cosmos which is his poem. He is maker and disposer of the universe, chief performer of cosmic yajna, purifier and sanctifier of the polluted, loving and adorable. O lord of power and purity, you are blissful, most honourable and companionable, adored by sages in yajnas with hymns of love and worship.