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यो दु॒ष्टरो॑ विश्ववार श्र॒वाय्यो॒ वाजे॒ष्वस्ति॑ तरु॒ता । स न॑: शविष्ठ॒ सव॒ना व॑सो गहि ग॒मेम॒ गोम॑ति व्र॒जे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yo duṣṭaro viśvavāra śravāyyo vājeṣv asti tarutā | sa naḥ śaviṣṭha savanā vaso gahi gamema gomati vraje ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यः । दु॒स्तरः॑ । वि॒श्व॒ऽवा॒र॒ । श्र॒वाय्यः॑ । वाजे॑षु । अस्ति॑ । त॒रु॒ता । सः । नः॒ । श॒वि॒ष्ठ॒ । सव॑ना । आ । व॒सो॒ इति॑ । ग॒हि॒ । ग॒मेम॑ । गोऽम॑ति । व्र॒जे ॥ ८.४६.९

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:46» मन्त्र:9 | अष्टक:6» अध्याय:4» वर्ग:2» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:9


शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - हम उपासकजन (तम्+इन्द्रम्) उस इन्द्रवाच्य परमात्मा से (दानम्+रायः) दातव्य धन की (ईमहे) याचना करते हैं, जो ईश्वर (शवसानम्) बलप्रदाता (अभीर्वम्) निर्भय और (ईशानम्) जगत् का स्वामी है ॥६॥
भावार्थभाषाः - हे मनुष्यों ! अपनी आकाङ्क्षा ईश्वर के निकट निवेदन करो। वह उसको पूर्ण करेगा ॥६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'दुष्टर, श्रवाय्य व तरुता' मद

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गतमन्त्र के मद का ही वर्णन करते हुए कहते हैं कि (यः) = जो, हे (विश्ववार) = सब से वरणीय प्रभो ! अथवा सब वरणीय वस्तुओंवाले प्रभो ! [मदः =] आपकी प्राप्ति से उत्पन्न मद है वह (दुष्टरः) = शत्रुओं से तैरने योग्य नहीं (श्रवाय्यः) = यह हमारे जीवन को यशस्वी बनानेवाला हैं, (वाजेषु) = संग्रामों में (तरुता अस्ति) = तरानेवाला है। [२] हे (शविष्ठ) = सर्वाधिक शक्तिसम्पन्न ! (वसो) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले प्रभो ! (सः) = वे आप (नः) = हमारे (सवना) = जीवनयज्ञों में (आगहि) = प्राप्त होइये । हम आपके अनुग्रह से (गोमति व्रजे) = प्रशस्त इन्द्रियोंवाले इस शरीररूप गृह में गोमत प्राप्त हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु प्राप्ति का मद 'दुष्टर, श्रवाय्य व तरुता' है। हमें प्रभु प्राप्त हों और हम प्रशस्त इन्द्रियोंवाले शरीर को प्राप्त हों।

शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - वयमुपासकाः शवसानम्=बलदातारम्। अभीर्वम्=अभीरुं निर्भयम्। ईशानम्=जगतः स्वामिनम्। तमिन्द्रम्। दानं=देयम्। रायः=धनम्। ईमहे=याचामहे ॥६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, lord omnificent of the world, omnipotent, haven and home of the universe, that divine joy, Ananda, which is difficult to attain, most renowned and profuse, ark of success over the seas and struggles of life, that Ananda, O lord, come and bring us, which may we attain in our yajnic sessions of meditation at the centre of our personality wherein the mind and senses converge and merge with spiritual consciousness.