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उ॒त त्वं म॑घवञ्छृणु॒ यस्ते॒ वष्टि॑ व॒वक्षि॒ तत् । यद्वी॒ळया॑सि वी॒ळु तत् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

uta tvam maghavañ chṛṇu yas te vaṣṭi vavakṣi tat | yad vīḻayāsi vīḻu tat ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

उ॒त । त्वम् । म॒घ॒ऽव॒न् । शृ॒णु॒ । यः । ते॒ । वष्टि॑ । व॒वक्षि॑ । तत् । यत् । वी॒ळया॑सि । वी॒ळु । तत् ॥ ८.४५.६

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:45» मन्त्र:6 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:43» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:6


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शिव शंकर शर्मा

इस ऋचा से फल दिखलाते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (येषाम्) जिन पुरुषों का (इन्द्रः) आत्मा (युवा+सखा) युवा और सखा है और जो अग्निहोत्र और ईश्वर की उपासनासहित है, (अयुद्धः+इत्) योद्धा न भी हों, तथापि (शूरः) शूरवीर होकर (सत्त्वभिः) निज आत्मिक बलों के साहाय्य से (युधा) विविध योद्धाओं से (वृतम्) आवृत शत्रु को भी (अजति) दूर फेंक देते हैं ॥३॥
भावार्थभाषाः - ईश्वर की उपासना और अग्निहोत्रादि कर्मों के सेवने से आत्मा बलिष्ठ होता है और अपने निकट भी पापों को नहीं आने देता है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कामना की पूर्ति व बल की प्राप्ति

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (मघवन्) = ऐश्वर्यशालिन् प्रभो ! (त्वं) = आप (उत शृणु) = हमारी प्रार्थना को अवश्य सुनिए। (यः) = जो स्तोता (ते वष्टि) = आपसे जिस वस्तु की कामना करता है, आप (तत् ववक्षि) = उस वस्तु को प्राप्त कराते हैं। [२] हे प्रभो ! (यत् वीडयासि) = जिसको भी आप शक्तिशाली बनाते हैं, (तत् वीडु) = वह दृढ़ शक्तिशाली होता ही है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु प्रार्थना को सुनकर स्तोता की कामना को पूर्ण करते ही हैं। स्तोता को वे दृढ़ बनाते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

अनया फलमादिशति।

पदार्थान्वयभाषाः - अग्निहोत्रेश्वरोपासनासहितः पुरुषः। अयुद्ध इत्=अयोद्धा अपि। शूरो वीरो भूत्वा। सत्त्वभिः=स्वकीयैरात्मबलैरेव। युधा=योद्धृगणैः। वृतमावृतमपि। शत्रुम्। अजति=प्रक्षिपति=दूरीकरोति। येषामिन्द्रो युवा सखा ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Now then, O lord of power, wealth and excellence, listen: Whoever asks of you something he desires, you bear and bring for him. Whoever you strengthen, he becomes strong. Are you not real mighty then?