उ॒त त्वा॑ धी॒तयो॒ मम॒ गिरो॑ वर्धन्तु वि॒श्वहा॑ । अग्ने॑ स॒ख्यस्य॑ बोधि नः ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
uta tvā dhītayo mama giro vardhantu viśvahā | agne sakhyasya bodhi naḥ ||
पद पाठ
उ॒त । त्वा॒ । धी॒तयः॑ । मम॑ । गिरः॑ । व्ऋ॒ध॒न्तु॒ । वि॒स्वहा॑ । अग्ने॑ । स॒ख्यस्य॑ । बो॒धि॒ । नः॒ ॥ ८.४४.२२
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:44» मन्त्र:22
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:40» मन्त्र:2
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:22
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वगतिप्रद ईश ! (त्वाम्) तुझको ही (मनीषिणः) मनस्वी विद्वान् ध्याते हैं। (त्वाम्) तुझको ही विद्वद्वर्ग (चित्तिभिः) चित्तों और विविध कर्मों के द्वारा (हिन्वन्ति) प्रसन्न करते हैं, अतः हे भगवन् ! (नः) हमारे (गिरः) वचन (त्वाम्+वर्धन्तु) आपकी ही कीर्ति को (वर्धन्तु) बढ़ावें ॥१९॥
भावार्थभाषाः - विद्वानों को उचित है कि वे उसी की पूजा करें करवावें और उसी की कीर्ति गावें। इतर जन भी इनका ही अनुकरण करें ॥१९॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
धीतयः-गिरः
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (उत) = और (मम) = मेरे (धीतयः) = कर्म तथा (गिरः) = स्तुतिवाणियाँ (विश्वहा) = सदा (त्वा वर्धन्तु) = आपका वर्धन करें। हम कर्मों के द्वारा आपका पूजन करें और स्तुतिवाणियों द्वारा आपके गुणों का प्रतिपादन करें। [२] हे अग्ने ! आप (नः) = हमारे (सख्यस्य) = मित्रभाव को (बोधि) = जानिये। हम सदा आपकी मैत्री में सब व्यवहारों को करनेवाले हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम कर्मों व स्तुतिवाणियों के द्वारा प्रभु का अपने में वर्धन करें। हे प्रभो ! हमें आपकी मित्रता सदा प्राप्त हो ।
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शिव शंकर शर्मा
पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने=सर्वगतिप्रद ! मनीषिणः=मनस्विनो विद्वांसः। त्वामेव ध्यायन्ति। त्वामेव। चित्तिभिः=चेतोभिः विविधकर्मभिश्च वा। हिन्वन्ति=प्रीणयन्ति। हे भगवन् ! अतः नोऽस्माकम्। गिरोवचनानि। त्वामेव वर्धन्तु। तवैव कीर्तिम्। वर्धयन्तु ॥१९॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - Agni, lord of united existence, may all my thoughts, words and actions adore, exalt and glorify you day and night. O lord of humanity, pray acknowledge and ever remember and maintain our bond of love and friendship with you.
