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हर॑यो धू॒मके॑तवो॒ वात॑जूता॒ उप॒ द्यवि॑ । यत॑न्ते॒ वृथ॑ग॒ग्नय॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

harayo dhūmaketavo vātajūtā upa dyavi | yatante vṛthag agnayaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

हर॑यः । धू॒मऽके॑तवः । वात॑ऽजूताः । उप॑ । द्यवि॑ । यत॑न्ते । वृथ॑क् । अ॒ग्नयः॑ ॥ ८.४३.४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:43» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:29» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:4


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शिव शंकर शर्मा

अग्निवाच्य ईश्वर की स्तुति।

पदार्थान्वयभाषाः - (विप्रस्य) मेधावी और विशेषकर ज्ञानविज्ञानप्रचारक (वेधसः) विविध स्तुतियों के कर्त्ता मुझ उपासक के (इमे+स्तोमासः) ये स्तोत्र (स्तृतयज्वनः) जिसके उपासक कभी हिंसित और अभिभूत नहीं होते और (गिरः) स्तवनीय परमपूज्य (अग्नेः) परमात्मा की ओर (ईरते) जाएँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - जिस ईश्वर के उपासक कभी दुःख में निमग्न नहीं होते, उसकी ही स्तुति मेरी जिह्वा करे, उसी की ओर मेरा ध्यानवचन पहुँचे ॥१॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अग्नयः [यज्ञाग्नियाँ]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अग्नयः) = यज्ञों की अग्नियाँ (हरयः) = हम सबके कष्टों का हरण करनेवाली होती हुई (वृथक्) = पृथक्-पृथक् स्थानों में (उप द्यवि) = अन्तरिक्षलोक में (यतन्ते) = रोगकृमिनाश के लिए यत्नशील होती हैं। [२] ये अग्नियाँ (धूमकेतवः) = धूमरूप ध्वजावाली हैं और (वातजूताः) = वायु द्वारा प्रेरित होती है। वायु इनका उद्बोधक होता है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यज्ञाग्नियाँ अन्तरिक्ष में उठती हुई रोगकृमिविनाश द्वारा यज्ञशील पुरुषों के कष्टों का अपहरण करती हैं।
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शिव शंकर शर्मा

अग्निवाच्येश्वरस्तुतिः।

पदार्थान्वयभाषाः - विप्रस्य=मेधाविनः। विशेषेण ज्ञानप्रचारकस्य वा। वेधसः=स्तुतीनां विधातुः। ममोपासकस्य इमे। स्तोमासः=स्तोमाः स्तुतयः। अस्तृतयज्वनः=अहिंसितयजमानस्य। गिरः=स्तवनीयस्य। अग्नेः=परमात्मनः। ईरते=ईरताम् गच्छन्तु ॥१॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - The fire, the sun, the lightning and the falling stars moved around by cosmic energy, all receptive and transmissive in their own orbit on earth, in heaven and across the skies, all giving the light and shade and fragrance of their nature and character in their own way, roam around in space as versions of Agni.