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यं त्वा॒ जना॑स इन्ध॒ते म॑नु॒ष्वद॑ङ्गिरस्तम । अग्ने॒ स बो॑धि मे॒ वच॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yaṁ tvā janāsa indhate manuṣvad aṅgirastama | agne sa bodhi me vacaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यम् । त्वा॒ । जना॑सः । इ॒न्ध॒ते । म॒नु॒ष्वत् । अ॒ङ्गि॒रः॒ऽत॒म॒ । अग्ने॑ । सः । बो॒धि॒ । मे॒ । वचः॑ ॥ ८.४३.२७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:43» मन्त्र:27 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:34» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:27


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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - मैं उपासक (विशाम्+राजानम्) प्रजाओं के स्वामी (अद्भुतम्) महाश्चर्य्य और (धर्मणाम्) निखिल कर्मों के (अध्यक्षम्) अध्यक्ष (इमम्+अग्निम्) इस अग्निवाच्य परमात्मा की (ईळे) स्तुति करता हूँ (सः+उ) वही (श्रवत्) हमारी प्रार्थना और स्तुति को सुनता है ॥२४॥
भावार्थभाषाः - सबका अधिपति और अध्यक्ष वही परमात्मा है, अतः क्या विद्वान् क्या मूर्ख क्या राजा और प्रजा, सबका वही पूज्य देव है ॥२४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मनुष्वत्

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अंगिरस्तम) = हमें अंग-प्रत्यंग में अधिक-से-अधिक रसमय बनानेवाले (अग्ने) = अग्रणी प्रभो ! (सः) = वे आप (मे वचः) = मेरे प्रार्थनावचन को (बोधि) = जानिए। मेरी पुकार को आप सुनिए । [२] वे आप मेरी पुकार को सुनिए (यः) = जिन (त्वा) = आपको (जनासः) = लोग (मनुष्वत्) = विचारशील पुरुष की तरह (इन्धते) = अपने अन्दर दीप्त करते हैं। जितना-जितना हम विचारशील बनते हैं, उतना- उतना प्रभु को अपने में दीप्त कर पाते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- हम विचारशील बनकर प्रभु को अपने में देखने का प्रयत्न करें। प्रभु ही हमारी प्रार्थना को सुनते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पदार्थान्वयभाषाः - अहमुपासकः। विशां=प्रजानां। राजानं=स्वामिनम्। अद्भुतम्। धर्मणां=कर्मणाम्। अध्यक्षम्=इममग्निम्। ईळे=स्तौमि। सः उ=स एव। श्रवत्=अस्माकं स्तुतिं शृणोति ॥२४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, light and power dearest as life breath, whom people kindle, raise and adore as a friend of humanity, pray listen, acknowledge and appreciate the truth and sincerity of my word and prayer.