तं त्वा॑ व॒यं ह॑वामहे शृ॒ण्वन्तं॑ जा॒तवे॑दसम् । अग्ने॒ घ्नन्त॒मप॒ द्विष॑: ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
taṁ tvā vayaṁ havāmahe śṛṇvantaṁ jātavedasam | agne ghnantam apa dviṣaḥ ||
पद पाठ
तम् । त्वा॒ । व॒यम् । ह॒वा॒म॒हे॒ । शृ॒ण्वन्त॑म् । जा॒तऽवे॑दसम् । अग्ने॑ । घ्नन्त॑म् । अप॑ । द्विषः॑ ॥ ८.४३.२३
ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:43» मन्त्र:23
| अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:33» मन्त्र:3
| मण्डल:8» अनुवाक:6» मन्त्र:23
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शिव शंकर शर्मा
पुनः उसी विषय को कहते हैं।
पदार्थान्वयभाषाः - (अग्ने) हे सर्वव्यापिन् सर्वशक्तिप्रद देव ! (अज्मेषु) स्वस्वगृहों में (अध्वरम्) याग पूजा पाठ उपासना आदि शुभकर्मों को (तन्वानाः) विस्तारपूर्वक करते हुए मेधावी जन (वाजिनम्) ज्ञानस्वरूप और बलप्रद (वह्निम्) इस सम्पूर्ण जगत् का ढोनेवाला (होतारम्) सर्वधनप्रदाता (तम्+त्वाम्) उस तेरी ही (ईळते) स्तुति करते हैं ॥२०॥
भावार्थभाषाः - प्रत्येक शुभकर्म में वही ईश्वर पूज्य है, अन्य नहीं ॥२०॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार
द्वेष का अप-हनन
पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (अग्ने) = अग्रणी प्रभो! (तं) = उन (शृणवन्तं) = हमारी प्रार्थना को सुनते हुए (जातवेदसम्) = सर्वज्ञ (त्वा) = आपको (वयं) = हम (हवामहे) = पुकारते हैं। [२] उन आपको पुकारते हैं, जो (द्विषः) = सब द्वेष की भावनाओं को (अपघ्नन्तम्) = हमारे से सुदूर विनष्ट कर रहे हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु के आराधन से हमारी सब द्वेष की प्रवृत्तियाँ विनष्ट हो जाती हैं।
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शिव शंकर शर्मा
पुनस्तमर्थमाह।
पदार्थान्वयभाषाः - हे अग्ने ! अज्मेषु=स्वस्वगृहेषु। अध्वरं यागं तवोपासनां। तन्वानाः=कुर्वाणा मेधाविनो जनाः। वाजिनं=ज्ञानस्वरूपं बलप्रदातारम्। वह्निम्=अस्य जगतो वोढारम्। पुनः। होतारम्=सर्वधनप्रदातारम्। ईदृशं तं त्वामेव। ईळते=स्तुवन्ति ॥२०॥
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डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - You, Agni, we adore who are listening, omnipresent and omniscient, destroyer of the jealous and violent adversaries.
