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तत्त॑द॒ग्निर्वयो॑ दधे॒ यथा॑यथा कृप॒ण्यति॑ । ऊ॒र्जाहु॑ति॒र्वसू॑नां॒ शं च॒ योश्च॒ मयो॑ दधे॒ विश्व॑स्यै दे॒वहू॑त्यै॒ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tat-tad agnir vayo dadhe yathā-yathā kṛpaṇyati | ūrjāhutir vasūnāṁ śaṁ ca yoś ca mayo dadhe viśvasyai devahūtyai nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

तत्ऽत॑त् । अ॒ग्निः । वयः॑ । द॒धे॒ । यथा॑ऽयथा । कृ॒प॒ण्यति॑ । ऊ॒र्जाऽआ॑हुतिः । वसू॑नाम् । शम् । च॒ । योः । च॒ । मयः॑ । द॒धे॒ विश्व॑स्यै दे॒वहू॑त्यै॒ । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.३९.४

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:39» मन्त्र:4 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:22» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:4


शिव शंकर शर्मा

पुनरपि अग्नि नाम से परमात्मा की स्तुति का आरम्भ करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (अग्निम्+अस्तोषि) मैं उपासक उस सर्वशक्तिप्रद अग्नि नाम से प्रसिद्ध परमात्मा की स्तुति करता हूँ, पुनः (ऋग्मियम्+अग्निम्) ऋचाओं से स्तवनीय उसी के गुणों का गान (यजध्वै) सर्व कर्मों में पूजनार्थ (ईडा) स्तुति द्वारा कर रहा हूँ, (नः+विदथे) हमारे यज्ञगृह में उपस्थित (देवान्) माननीय विद्वान् जनों को (अनक्तु) शुभकर्म में वह लगावे। जो ईश (कविः) सर्वज्ञ है और (उभे+अन्तः) इन दोनों लोकों के मध्य (दूत्यम्+चरति) दूत के समान काम कर रहा है, उसी की कृपा से (अन्यके+समे) अन्यान्य सब ही शत्रु (नभन्ताम्) विनष्ट हो जाएँ ॥१॥
भावार्थभाषाः - ऐसे स्थलों में अग्नि नाम ईश्वर का ही है, जो सर्वगत सर्वलीन है। जैसे सबमें अग्नि विद्यमान है, वह महाकवि और ध्येय पूज्य है ॥१॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

शं-योः-मयः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] एक स्तोता (यथा यथा) = जैसे-जैसे (कृपण्यति) = याचना करता है, (अग्निः) = प्रभु (तत् तत्) = उस-उस (वयः) = जीवन को (दधे) = धारण करते हैं। अभ्युदय की कामनावाले को अभ्युदय प्राप्त कराते हैं, तो निःश्रेयस की कामनावाले को निःश्रेयस के योग्य बनाते हैं। (ऊर्जाहुति:) [हु दाने] = बल व प्राणशक्ति को देनेवाले प्रभु (वसूनां) = अपने निवास को उत्तम बनानेवालों को (शं) = शान्ति, (च) = और (योः) = भयों का शमन [ दूरीकरण], (च) = तथा (मयः) = सुख (दधे) = प्राप्त कराते हैं। [२] प्रभु इन वसुओं के लिए (विश्वस्यै देवहूत्यै) = सब दिव्यगुणों के आह्वान के लिए होते हैं। प्रभु इनके जीवनों में सब दिव्यगुणों का धारण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- उपासक की कामना के अनुसार प्रभु उसके जीवन को बनाते हैं। उसे शान्ति,निर्भयता व सुख प्राप्त कराते हैं उसे दिव्य गुणों में स्थापित करके काम-क्रोध आदि से रहित करते हैं।

शिव शंकर शर्मा

पुनरप्यग्निनाम्ना परमात्मस्तुतिरारभ्यते।

पदार्थान्वयभाषाः - अहम्=अग्निम्=सर्वशक्तिप्रदमीश्वरम्। अस्तोषि=स्तौमि। पुनः=ऋग्मिम्=ऋग्भिरर्चनीयम्। अग्निम्। यजध्वै=यष्टम्। ईडा=स्तुत्या स्तौमि। सोऽग्निः। नः=अस्माकम्। विदथे=यज्ञगृहे। देवान्=उपस्थितान् मान्यान्। आनक्तु=स्वस्वकर्मणि प्रेरयतु। हि=यतः। स कविः=सर्वज्ञोऽस्ति। तथा। उभे=द्यावापृथिव्यौ अन्तर्मध्ये। दूत्यम्=दूतकर्म। चरति। तत्कृपया। अन्यके=शत्रवोऽपि। समे=सर्वे। नभन्ताम्=विनश्यन्तु। नभतिर्हिंसाकर्मा ॥१॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni bears, brings and bestows upon the supplicant all the food, energy, health and joy as it is asked for. Agni is the giver of plenty of energy, peace, happiness and freedom from suffering and disease for liberal service in honour of all the divinities of nature and humanity. May all negativities and adversities vanish.