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अ॒ग्निम॑स्तोष्यृ॒ग्मिय॑म॒ग्निमी॒ळा य॒जध्यै॑ । अ॒ग्निर्दे॒वाँ अ॑नक्तु न उ॒भे हि वि॒दथे॑ क॒विर॒न्तश्चर॑ति दू॒त्यं१॒॑ नभ॑न्तामन्य॒के स॑मे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agnim astoṣy ṛgmiyam agnim īḻā yajadhyai | agnir devām̐ anaktu na ubhe hi vidathe kavir antaś carati dūtyaṁ nabhantām anyake same ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निम् । अ॒स्तो॒षि॒ । ऋ॒ग्मिय॑म् । अ॒ग्निम् । ई॒ळा । य॒जध्यै॑ । अ॒ग्निः । दे॒वान् । अ॒न॒क्तु॒ । नः॒ । उ॒भे इति॑ । हि । वि॒दथे॒ इति॑ । क॒विः । अ॒न्तरिति॑ । चर॑ति । दू॒त्य॑म् । नभ॑न्ताम् । अ॒न्य॒के । स॒मे॒ ॥ ८.३९.१

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:39» मन्त्र:1 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:22» मन्त्र:1 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:1


शिव शंकर शर्मा

पुनः उसी विषय को कहते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - (इन्द्राग्नी) हे राजन् तथा हे दूत ! आप दोनों (सुन्वतः) शुभ कर्मों में प्रवृत्त (श्यावाश्वस्य) रोगी पुरुष का तथा (अत्रीणाम्) माता, पिता और बन्धु इन तीनों से रहित अनाथों का (हवम्) निवेदन (शृणुतम्) सुनिये। और (सोमपीतये) सोमादि पदार्थों को पीने के लिये यहाँ आवें ॥८॥
भावार्थभाषाः - रोगी और अनाथादि सबसे प्रथम द्रष्टव्य और पालनीय है ॥८॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु-स्तवन के द्वारा दिव्यता की प्राप्ति व दोषदहन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋग्मियं) = स्तुति के योग्य (अग्निं) = उस अग्रणी प्रभु से (अस्तोषि) = स्तवन करता हूँ। उस (अग्निं) = प्रभु को (यजध्यै) = अपने साथ संगत करने के लिए यजध्यै मैं उसका यजन करता हूँ। वह (अग्निः) = अग्रणी प्रभु (नः) = हमारे लिए देवान् सब दिव्यभावों को (अनक्तु) = प्राप्त कराए। प्रभु के सम्पर्क में दिव्यता प्राप्त होती ही है। [२] वह (कविः) = क्रान्तदर्शी सर्वज्ञ प्रभु (हि) = ही (उभे) = दोनों द्यावापृथिवी अथवा प्रकृति व आत्मतत्त्व के विदथे ज्ञान के निमित्त (अन्तः) = हमारे हृदयों में (दूत्यं चरति) = ज्ञान-सन्देश वहन के कार्य को करते हैं। प्रभु ही सब ज्ञानों के स्रोत हैं। इन ज्ञानों के परिणामस्वरूप (समे अन्यके) = सब काम-क्रोध आदि शत्रु (नभन्ताम्) = विनष्ट हो जाएँ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ:- प्रभु स्तवन के द्वारा प्रभु का मेल होने पर दिव्यता प्राप्त होती है तथा वह ज्ञान प्राप्त होता है, जिस ज्ञान में सब काम-क्रोध आदि का दहन हो जाता है।

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदेवाह।

पदार्थान्वयभाषाः - हे इन्द्राग्नी ! युवाम्। सुन्वतः=कर्माणि कुर्वतः। श्यावाश्वस्य=रुग्णेन्द्रियस्य। अत्रीणाम्=अनाथानाञ्च। हवम्=आह्वानम्। शृणुतम्। तथा सोमपीतये। आगच्छतम् ॥८॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I worship Agni, lord of light and fire of life, giver of enlightenment, adored in Rks of the Veda. I invoke and adore Agni to join me at yajna for advancement and pray that it may inspire and bring us the benefit of other divinities of nature and humanity. The poet, creator, omniscient power at yajna, traverses between both heaven and earth and communicates between body and spirit like a messenger, an inspiration, and while Agni is at work all adversaries and negativities would vanish.