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स्वर॑न्ति त्वा सु॒ते नरो॒ वसो॑ निरे॒क उ॒क्थिन॑: । क॒दा सु॒तं तृ॑षा॒ण ओक॒ आ ग॑म॒ इन्द्र॑ स्व॒ब्दीव॒ वंस॑गः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

svaranti tvā sute naro vaso nireka ukthinaḥ | kadā sutaṁ tṛṣāṇa oka ā gama indra svabdīva vaṁsagaḥ ||

पद पाठ

स्वर॑न्ति । त्वा॒ । सु॒ते । नरः॑ । वसो॒ इति॑ । नि॒रे॒के । उ॒क्थिनः॑ । क॒दा । सु॒तम् । तृ॒षा॒णः । ओकः॑ । आ । ग॒मः॒ । इन्द्र॑ । स्व॒ब्दीऽइ॑व । वंस॑गः ॥ ८.३३.२

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ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:33» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:3» वर्ग:7» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:5» मन्त्र:2


हरिशरण सिद्धान्तालंकार

स्वब्दीव वंसगः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वसो) = हमारे निवास को उत्तम बनानेवाले प्रभो ! (उक्थिनः) = स्तोता (नरः) = लोग (सुते) = शरीर में सोम का सम्पादन करने पर तथा (निरेके) = [रेकृ शंकायाम्] शंकाशून्य हृदय के होने पर, आप में पूर्ण श्रद्धा के होने पर (त्वा स्वरन्ति) = आपके स्तोत्रों का उच्चारण करते हैं, आपके गुणों का गायन करते हैं। [२] हे (इन्द्र) = सब शत्रुओं का विद्रावण करनेवाले प्रभो! (कदा) = कब (सुतं तृषाण:) = उत्पन्न सोम के प्रति तीव्र व्याप्तवाला होता हुआ, सोमरक्षण की प्रबल कामनावाला होता हुआ यह स्तोता (ओके आगमः) = अपने घर में आयेगा ? अर्थात् विषयों में न भटकता हुआ कब यह अन्तर्मुखी वृत्तिवाला बनेगा ! कब यह (स्वब्दी इव) = उत्तम वर्षोंवाले पुरुष के समान होगा? अर्थात् कब समझदार होकर (वंसगः) = वननीय, सुन्दर गतिवाला होगा।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का उपासन वही करता है जो [क] सोम का रक्षण करता है तथा [ख] हृदय में प्रभुसत्ता के विषय में शंका रहित होता है। यह यही चाहता है कि मैं [क] सोम का रक्षण कर पाऊँ, [ख] इन्द्रियों को विषयों में भटकने से रोक सकूँ, [ग] तथा समझदार बनकर सुन्दर आचरणवाला होऊँ।

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Indra, Vasu, giver of peace and security in self settlement, while the soma of faith and love has been distilled in the heart and the devotees sing and celebrate your honour in hymns of praise, when would you, keen to join us at the celebration, come to the yajnic hall thirsting to meet the people you love and admire.