वांछित मन्त्र चुनें

व॒यं वो॑ वृ॒क्तब॑र्हिषो हि॒तप्र॑यस आनु॒षक् । सु॒तसो॑मासो वरुण हवामहे मनु॒ष्वदि॒द्धाग्न॑यः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

vayaṁ vo vṛktabarhiṣo hitaprayasa ānuṣak | sutasomāso varuṇa havāmahe manuṣvad iddhāgnayaḥ ||

पद पाठ

व॒यम् । वः॒ । वृ॒क्तऽब॑र्हिषः । हि॒तऽप्र॑यसः । आ॒नु॒षक् । सु॒तऽसो॑मासः । व॒रु॒ण॒ । ह॒वा॒म॒हे॒ । म॒नु॒ष्वत् । इ॒द्धऽअ॑ग्नयः ॥ ८.२७.७

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:27» मन्त्र:7 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:32» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:7


410 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पुनः वही विषय आ रहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - (वरुण) हे राजप्रतिनिधे ! (वः) आप लोगों को (वयम्) हम सब (आनुषक्) सर्वदा और क्रम से (हवामहे) न्यायार्थ बुलाते हैं। जो हम (वृक्तबर्हिषः) आसनादि सामग्रीसम्पन्न हैं, (हितप्रयसः) जिनके अन्न हितकार्य्य में लगे रहते हैं (सुतसोमासः) सोमादि यज्ञ करनेवाले (मनुष्वत्) विज्ञानी पुरुष के समान (इद्धाग्नयः) और जो सदा अग्निहोत्रादि कर्म में लगे रहते हैं ॥७॥
भावार्थभाषाः - अपने निकट जो वस्तु हों, उनसे अपना और पर का हित सिद्ध करे और समय-२ पर अच्छे पुरुषों को बुलाकर अपने गृह पर सत्कार करे ॥७॥
410 बार पढ़ा गया

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वृक्तबर्हिषः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (वरुण) = सब पापों का निवारण करनेवाले प्रभो ! (वयम्) = हम (वः) = आपको (आनुषक्) = निरन्तर हवामहे पुकारते हैं। वे हम आपको पुकारते हैं, जो (वृक्तबर्हिषः) = पापशून्य किया है। हृदयान्तरिक्ष को जिन्होंने' ऐसे हैं। (हितप्रयसः) = ' धारण किया है सात्त्विक अन्नों को जिन्होंने ' ऐसे हैं। और इस प्रकार (सुतसोमासः) = ' उत्पन्न किया है सोम जिन्होंने ' ऐसे हैं। हृदय को पापशून्य करके सात्त्विक अन्नों का सेवन करनेवाले ही सोम का रक्षण कर पाते हैं। [२] सोमरक्षण के द्वारा ये (इवाग्नयः) = समिद्ध ज्ञानग्नि की दीप्तिवाले हैं। ये ज्ञानाग्नि को समिद्ध करके (मनुः वत्) = विचारशील पुरुष बने हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु के उपासक [क] हृदय से पापों को दूर करते हैं, [ख] सात्त्विक अन्न का सेवन करते हैं, [ग] सोम का रक्षण करते हैं, [घ] ज्ञानाग्नि को दीप्त करते हैं, [ङ] विचारशील बनते हैं।
410 बार पढ़ा गया

शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदनुवर्तते।

पदार्थान्वयभाषाः - वरुण=हे राजप्रतिनिधे ! वयम्। मनुष्वद्=विज्ञानिवत्। वः=युष्मान्। आनुषक्=क्रमशः सर्वदा वा। हवामहे। कीदृशा वयम्। वृक्तबर्हिषः=बर्हिरादिसाधनसम्पन्नाः। हितप्रयसः= हितधनाः। सुतसोमासः=सोमादियज्ञकारिणः। पुनः। इद्धाग्नयः। समिद्धाग्नयः ॥७॥
410 बार पढ़ा गया

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O Varuna, lord of light and justice, day and night, and other divine powers of nature and humanity, like men of love and faith we invoke and adore you now as ever. The grass carpets are spread and occupied, the sacred fires are lit, the fragrant havis is ready for offering, and the soma is pressed and distilled for the oblation.