पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नः) = हमें वह (पूर्व्यः) = पालन व पूरण करनेवालों में उत्तम (अध्वरः) = यज्ञात्मक कर्म (प्र सु एतु) = प्रकर्षेण सम्यक् प्राप्त हो। जो यज्ञ (अग्ना) = [अग्रेणी] अग्रेणी पुरुष में होता है, निरन्तर उन्नतिपथ पर आगे बढ़नेवाला पुरुष जिस यज्ञ को करता है, वह यज्ञ हमें प्राप्त हो। इसी प्रकार (देवेषु) = देववृत्तिवाले पुरुष में जो यज्ञ होता है, वह यज्ञ हमें प्राप्त हो। उस यज्ञ को करते हुए हम भी देव बनें। [२] (आदित्येषु) = [आवानात् आदित्यः] सब स्थानों से अच्छाई को ग्रहण करनेवाले पुरुषों में जो यज्ञ होता है, वह हमें प्राप्त हो। इसी प्रकार (प्रधृत व्रते) = प्रकर्षेण व्रतों को धारण करनेवाले (वरुणे) = पापों से निवृत्त, निर्दोष जीवनवाले पुरुष में जो यज्ञ होता है उस यज्ञ को हम प्राप्त करें। और अन्ततः (विश्वभानुषु) = सर्वत्र प्रविष्ट तेजस्वितावाले, अंग-प्रत्यंग में तेजस्वितावाले, (मरुत्सु) = प्राणसाधक पुरुषों में जो यज्ञ होता है, वह यज्ञ हमें भी प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पालक व पूरक यज्ञों को करते हुए हम 'अग्नि, देव, आदित्य, धृतव्रत वरुण व विश्वभानु मरुत्' बनें।