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प्र सू न॑ एत्वध्व॒रो॒३॒॑ऽग्ना दे॒वेषु॑ पू॒र्व्यः । आ॒दि॒त्येषु॒ प्र वरु॑णे धृ॒तव्र॑ते म॒रुत्सु॑ वि॒श्वभा॑नुषु ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pra sū na etv adhvaro gnā deveṣu pūrvyaḥ | ādityeṣu pra varuṇe dhṛtavrate marutsu viśvabhānuṣu ||

पद पाठ

प्र । सु । नः॒ । ए॒तु॒ । अ॒ध्व॒रः । अ॒ग्ना । दे॒वेषु॑ । पू॒र्व्यः । आ॒दि॒त्येषु॑ । प्र । वरु॑णे । धृ॒तऽव्र॑ते । म॒रुत्ऽसु॑ । वि॒श्वऽभा॑नुषु ॥ ८.२७.३

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:27» मन्त्र:3 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:31» मन्त्र:3 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:3


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शिव शंकर शर्मा

यज्ञ-विस्तार के लिये प्रार्थना करते हैं।

पदार्थान्वयभाषाः - हे भगवन् ! (नः) हमारे (पूर्व्यः+अध्वरः) पूर्ण यज्ञ प्रथम (अग्ना) तुझ में तथा (देवेषु) अन्यान्य देवों में (सु) अच्छे प्रकार (प्रैतु) प्राप्त हो और (आदित्येषु) आदित्यगणों में (धृतव्रते+वरुणे) व्रतधारी वरुण में और (विश्वभानुषु+मरुत्सु) विश्वव्यापी तेजोयुक्त वायुगणों में (प्रैतु) प्राप्त हो ॥३॥
भावार्थभाषाः - यज्ञ का फल इस पृथिवी से लेकर सूर्य्यपर्य्यन्त विस्तीर्ण हो, यह इससे प्रार्थना है ॥३॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यज्ञ की महिमा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (नः) = हमें वह (पूर्व्यः) = पालन व पूरण करनेवालों में उत्तम (अध्वरः) = यज्ञात्मक कर्म (प्र सु एतु) = प्रकर्षेण सम्यक् प्राप्त हो। जो यज्ञ (अग्ना) = [अग्रेणी] अग्रेणी पुरुष में होता है, निरन्तर उन्नतिपथ पर आगे बढ़नेवाला पुरुष जिस यज्ञ को करता है, वह यज्ञ हमें प्राप्त हो। इसी प्रकार (देवेषु) = देववृत्तिवाले पुरुष में जो यज्ञ होता है, वह यज्ञ हमें प्राप्त हो। उस यज्ञ को करते हुए हम भी देव बनें। [२] (आदित्येषु) = [आवानात् आदित्यः] सब स्थानों से अच्छाई को ग्रहण करनेवाले पुरुषों में जो यज्ञ होता है, वह हमें प्राप्त हो। इसी प्रकार (प्रधृत व्रते) = प्रकर्षेण व्रतों को धारण करनेवाले (वरुणे) = पापों से निवृत्त, निर्दोष जीवनवाले पुरुष में जो यज्ञ होता है उस यज्ञ को हम प्राप्त करें। और अन्ततः (विश्वभानुषु) = सर्वत्र प्रविष्ट तेजस्वितावाले, अंग-प्रत्यंग में तेजस्वितावाले, (मरुत्सु) = प्राणसाधक पुरुषों में जो यज्ञ होता है, वह यज्ञ हमें भी प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पालक व पूरक यज्ञों को करते हुए हम 'अग्नि, देव, आदित्य, धृतव्रत वरुण व विश्वभानु मरुत्' बनें।
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शिव शंकर शर्मा

यज्ञविस्ताराय प्रार्थयते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे भगवन् ! तव कृपया। नोऽस्माकम्। पूर्व्यः=पूर्णः। अध्वरः=यज्ञः। अग्ना=अग्नौ। सु=सुष्ठु। प्रैतु। देवेषु=आदित्येषु। धृतव्रते वरुणे। विश्वभानुषु= सर्वव्याप्ततेजस्केषु मरुत्सु च। प्रैतु ॥३॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May our yajna of universal order join the fire and rise to the divinities of nature, the sun in progressive Zodiacs, the oceans of earth and space in the fixed order of cosmic law, and all the light radiations of the universe across the suns.