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त्वां हि सु॒प्सर॑स्तमं नृ॒षद॑नेषु हू॒महे॑ । ग्रावा॑णं॒ नाश्व॑पृष्ठं मं॒हना॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvāṁ hi supsarastamaṁ nṛṣadaneṣu hūmahe | grāvāṇaṁ nāśvapṛṣṭham maṁhanā ||

पद पाठ

त्वाम् । हि । सु॒प्सरः॑ऽतमम् । नृ॒ऽसद॑नेषु । हू॒महे॑ । ग्रावा॑णम् । न । अश्व॑ऽपृष्ठम् । मं॒हना॑ ॥ ८.२६.२४

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:26» मन्त्र:24 | अष्टक:6» अध्याय:2» वर्ग:30» मन्त्र:4 | मण्डल:8» अनुवाक:4» मन्त्र:24


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शिव शंकर शर्मा

पुनः वही विषय आ रहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - हे सेनानायक ! (नृसदनेषु) मनुष्यों की बड़ी-२ सभाओं में (त्वां हि) आपको (हूमहे) निमन्त्रण देकर बुलाते हैं (सुप्सरस्तमम्) अपनी कीर्ति और यश से आपका शरीर अतिशय सुगन्धित और सुन्दर हो रहा है, जो आप (ग्रावाणम्+न) अपने कार्य्य में अचलवत् अचल हैं (अश्वपृष्ठम्) और जिसके सर्वाङ्ग सांग्रामिक घोड़े के समान बलिष्ठ और संगठित हैं ॥२४॥
भावार्थभाषाः - प्रत्येक शुभकर्म में राजवत् सेनानी भी आदरणीय है ॥२४॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दृढ़ शरीर व उत्तम इन्द्रियाश्व

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे वायो! (त्वां हि) = तुझे ही (नृषदनेषु) = मनुष्यों से बैठने योग्य इन यज्ञगृहों में, यज्ञों के अवसर पर (हूमहे) = पुकारते हैं। यज्ञों का मुख्य उद्देश्य वायु शुद्धि ही तो होता है। उस वायु को हम पुकारते हैं। जो (सुप्सरस्तमम्) = अतिशयेन शोभन रूपवाला है। यह वायु स्वास्थ्य के द्वारा सुन्दर रूप को प्राप्त कराता है। [२] हे वायो ! तुझे (मंहना) = स्तुति के द्वारा पुकारते हैं जो तू (ग्रावाण न) = ग्रावा के समान (अश्वपृष्ठ) = अश्वों का पृष्ठ है। शरीर को तू ग्रावा [पत्थर] के समान दृढ़ बनाता है और इन्द्रियाश्वों का तो तू आधार ही है। वायु ही शरीर व इन्द्रियों को स्वस्थ करता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-यज्ञों द्वारा वायु को पवित्र करते हुए हम दृढ़ शरीरों व उत्तम इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करते हैं।
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शिव शंकर शर्मा

पुनस्तदनुवर्तते।

पदार्थान्वयभाषाः - हे वायो ! नृसदनेषु=मनुष्यसभासु। त्वां हि। हूमहे। कीदृशम्। सुप्सरस्तमम्=अतिशोभनम्। ग्रावाणम्+न=अचलसमम्। पुनः। अश्वपृष्ठम्=अश्ववत् दृढाङ्गम्। पुनः। मंहना=महत्वेन युक्तम् ॥२४॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vayu, blissful of form, strong and renowned all round by your own strength and grandeur, we invoke and invite you to people’s halls of yajna, power adorable as a rock in its place, position and function.