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दधा॑मि ते॒ मधु॑नो भ॒क्षमग्रे॑ हि॒तस्ते॑ भा॒गः सु॒तो अ॑स्तु॒ सोम॑: । अस॑श्च॒ त्वं द॑क्षिण॒तः सखा॒ मेऽधा॑ वृ॒त्राणि॑ जङ्घनाव॒ भूरि॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

dadhāmi te madhuno bhakṣam agre hitas te bhāgaḥ suto astu somaḥ | asaś ca tvaṁ dakṣiṇataḥ sakhā me dhā vṛtrāṇi jaṅghanāva bhūri ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दधा॑मि । ते॒ । मधु॑नः । भ॒क्षम् । अग्रे॑ । हि॒तः । ते॒ । भा॒गः । सु॒तः । अ॒स्तु॒ । सोमः॑ । असः॑ । च॒ । त्वम् । द॒क्षि॒ण॒तः । सखा॑ । मे॒ । अध॑ । वृ॒त्राणि॑ । ज॒ङ्घ॒ना॒व॒ । भूरि॑ ॥ ८.१००.२

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:100» मन्त्र:2 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:4» मन्त्र:2 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:2


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'दक्षियातः सखा' [पूर्ण विश्वसनीय मित्र प्रभु]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे प्रभो! (ते) = आपके (मधुनः) = इस जीवन को मधुर बनानेवाले सोम के (भक्षम्) = भोजन को, शरीर के अन्दर धारण को (अग्रे दधामि) = सब से पहले स्थापित करता हूँ। मैं सोमरक्षण को अपना मूल कर्त्तव्य बनाता हूँ। (सुतः सोमः) = शरीर में उत्पन्न सोम (ते) = आपकी प्राप्ति के लिये (हितः भागः अस्तु) = शरीर में सुरक्षित भजनीय वस्तु बने। सोमरक्षण के द्वारा मैं आपको प्राप्त करनेवाला बनूँ। [२] (च) = और हे प्रभो ! इस सोमरक्षण के होने पर (त्वम्) = आप (मे) = मेरे (दक्षिणतः सखा) = दाहिने हाथ के रूप में मित्र पूर्ण विश्वसनीय मित्र (असः) = हों। आपको मित्र रूप में पाकर (अधा) = अब वृत्राणि वृत्रों को, वासनाओं को (भूरि जङ्घनाव) = खूब ही विनष्ट करें।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम सोमरक्षण को प्राथमिकता दें। इसके रक्षण को ही प्रभु प्राप्ति का साधन जानें। आप मेरे विश्वसनीय मित्र हों। हम दोनों मिलकर वासना रूप शत्रुओं का खूब ही विनाश करें।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I bear my portion of the honey sweets of life primarily for you in gratitude, out of which the soma essence distilled from experience would be offered in homage. May you, I pray, be kind and friendly to me on the right and then together we shall eliminate evil and darkness from life.