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दे॒वीं वाच॑मजनयन्त दे॒वास्तां वि॒श्वरू॑पाः प॒शवो॑ वदन्ति । सा नो॑ म॒न्द्रेष॒मूर्जं॒ दुहा॑ना धे॒नुर्वाग॒स्मानुप॒ सुष्टु॒तैतु॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

devīṁ vācam ajanayanta devās tāṁ viśvarūpāḥ paśavo vadanti | sā no mandreṣam ūrjaṁ duhānā dhenur vāg asmān upa suṣṭutaitu ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

दे॒वीम् । वाच॑म् । अ॒ज॒न॒य॒न्त॒ । दे॒वाः । ताम् । वि॒श्वऽरू॑पाः । प॒शवः॑ । व॒द॒न्ति॒ । सा । नः॒ । म॒न्द्रा । इष॑म् । ऊर्ज॑म् । दुहा॑ना । धे॒नुः । वाक् । अ॒स्मान् । उप॑ । सुऽस्तु॒ता । ए॒तु॒ ॥ ८.१००.११

ऋग्वेद » मण्डल:8» सूक्त:100» मन्त्र:11 | अष्टक:6» अध्याय:7» वर्ग:5» मन्त्र:5 | मण्डल:8» अनुवाक:10» मन्त्र:11


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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

वाग् धेनुः

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (देवीम्) = सब विज्ञानों का (द्योतन) = [प्रकाश] करनेवाली (वाचम्) = इस वेदवाणी को (देवा:) = देववृत्ति के ज्ञानी पुरुष (अजनयन्त) = अपने हृदयों में प्रादुर्भूत करते हैं। (ताम्) = उस वेदवाणी को (विश्वरूपाः) = विश्व का निरूपण करनेवाले, वेदवाणी के द्वारा विश्व का ज्ञान प्राप्त करनेवाले (पशवः) = द्रष्टा पुरुष (वदन्ति) = लोगों के लिये उपदिष्ट करते हैं। [२] (सा) = वह (वाग् धेनुः) = वेदवाणी रूप गौ (नः) = हमारे लिये (मन्द्रा) = आनन्द की जनक, (इषं ऊर्जं दुहाना) = अन्न व रस को प्राप्त करानेवाली, (सुष्टुता) = हमारे से सम्यक् स्तुत हुई हुई (अस्मान् उपैतु) = हमें समीपता से प्राप्त हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - यह वेदवाणी देव पुरुषों के हृदयों में प्रादुर्भूत होती है। ये द्रष्टा पुरुष लोगों के लिये इसका उपदेश करते हैं। वह हमारे लिये आनन्द को देनेवाली, अन्न-रस का दोहन करनेवाली वेदवाणी रूप गौ हमारे से स्तुत हो और हमें प्राप्त हो ।
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Sages and scholars, brilliant and wise, manifest and speak in human language that divine speech of omniscience which, then, all living and seeing forms of beings speak in its extended forms of variety over the world. That divine speech, joyous and generous like the milch cow, giving nourishment and energy, honoured, served and studied, may, we pray, come direct to us and bless.