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देवता: वायु: ऋषि: वसिष्ठः छन्द: त्रिष्टुप् स्वर: धैवतः
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रा॒ये नु यं ज॒ज्ञतू॒ रोद॑सी॒मे रा॒ये दे॒वी धि॒षणा॑ धाति दे॒वम् । अध॑ वा॒युं नि॒युत॑: सश्चत॒ स्वा उ॒त श्वे॒तं वसु॑धितिं निरे॒के ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

rāye nu yaṁ jajñatū rodasīme rāye devī dhiṣaṇā dhāti devam | adha vāyuṁ niyutaḥ saścata svā uta śvetaṁ vasudhitiṁ nireke ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

रा॒ये । नु । यम् । ज॒ज्ञतुः॑ । रोद॑सी॒ इति॑ । इ॒मे इति॑ । रा॒ये । दे॒वी । धि॒षणा॑ । धा॒ति॒ । दे॒वम् । अध॑ । वा॒युम् । नि॒ऽयुतः॑ । स॒श्च॒त॒ । स्वाः । उ॒त । श्वे॒तम् । वसु॑ऽधितिम् । नि॒रे॒के ॥ ७.९०.३

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ऋग्वेद » मण्डल:7» सूक्त:90» मन्त्र:3 | अष्टक:5» अध्याय:6» वर्ग:12» मन्त्र:3 | मण्डल:7» अनुवाक:6» मन्त्र:3


आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यम्) जिस पदार्थविद्यावेत्ता पुरुष को (रोदसी) द्युलोक और पृथ्वीलोक ने (राये) ऐश्वर्य्य के लिये उत्पन्न किया है और (देवं) जिस दिव्यशक्तिसम्पन्न पुरुष को (धिषणा) स्तुतिरूप (देवी) दिव्यशक्ति (धाति) धारण करती है, (वायुं) उस पदार्थविद्यावेत्ता विद्वान् को (नियुतः) जो पदार्थविद्या के लिये नियुक्त किया गया है, (सश्चत) तुम सेवन करो (उत) और (निरेके) दरिद्र के दूर करने के लिये (अध) और (श्वेतं) पवित्र (वसुधितिं) धन को (स्वाः) उस आत्मभूत विद्वान् के लिये तुम उत्पन्न करने का यत्न करो ॥३॥
भावार्थभाषाः - स्वभावोक्ति अलङ्कार द्वारा इस मन्त्र में परमात्मा यह उपदेश करते हैं कि मानो प्रकृति ने ही ऐसे पुरुष को उत्पन्न किया है, जो संसार के दरिद्र का नाश करता है। ऐसा पुरुष जिस देश में उत्पन्न होता है, उस देश में अनैश्वर्य और दरिद्रता का गन्ध भी नहीं रहता ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

तीन सभाएँ

पदार्थान्वयभाषाः - पदार्थ- (इमे रोदसी) = आकाश व भूमि के तुल्य ये माता-पिता, राजसभा-प्रजासभा दोनों (राये) = राष्ट्र में ऐश्वर्य वृद्धि के लिये (नु) = ही (यं) = जिसको (जज्ञतुः) = उत्पन्न करते और (यं देवम्) = जिस विजिगीषु को धिषणा देवी सर्वोपरि विद्यमान (विद्वत्सभा) = भी (राये) = ऐश्वर्य - रक्षा के लिये (धाति) = स्थापित करती है, उस (वायुं) = शत्रु को वायुवत् मूल से उखाड़ने में समर्थ पुरुष को (स्वा:) = उसकी अपनी (नियुतः) = लक्षों सेनाएँ और प्रजाएँ (सञ्चत) = प्राप्त होती हैं (उत) = और उसी (श्वेतं) = शुद्धाचारी को (निरेके) = श्रेष्ठ पद पर (वसु-धितिम्) = ऐश्वर्य की ख्यातिवाला जानकर प्राप्त होते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- राष्ट्र में समस्त व्यवस्थाएँ सुचारु रूप से चलाने के लिए तथा राष्ट्र को उन्नति के शिखर पर प्रतिष्ठित करने के लिए राजसभा, प्रजासभा तथा विद्वत्सभा इन तीनों का गठन होना चाहिए। ये सभाएँ मिलकर सदाचारी, वीर, पराक्रमी तथा नीति निपुण व्यक्ति को राजा के पद पर नियुक्त करें।

आर्यमुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यम्) पदार्थविद्यावेत्तारं यं पुरुषं (रोदसी) द्यावापृथिव्यौ (राये) ऐश्वर्याय (जज्ञतुः) उत्पादयामासतुः, तथा (देवम्) दिव्यशक्तिसम्पन्नं पुरुषं (धिषणा) स्तुतिरूपा (देवी) दिव्यशक्तिः (धाति) धारयति (वायुम्) तं पदार्थविद्यावेत्तारं (नियुतः) यो हि तद्विद्यायां नियुक्तः, तं (सश्चत) सेवतां (उत) तथा (निरेके) दरिद्रं विनाशयितुं (अध) तथा (श्वेतम्) पवित्रं (वसुधितिम्) धनं च लब्धुं (स्वाः) आत्मभूतं तं विद्वांसमुत्पादयितुं यतस्व ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Vayu is the brilliant and generous power of energy which the heaven and earth generate for the production of wealth, the light of which the divine voice of omniscience, Veda, holds and bears for the knowledge of humanity. This pure and brilliant power, treasure hold of wealth and prosperity, Vayu, its own companion forces serve, and bear it to fight out want and poverty where they prevail.