इ॒मो अ॑ग्ने वी॒तत॑मानि ह॒व्याज॑स्रो वक्षि दे॒वता॑ति॒मच्छ॑। प्रति॑ न ईं सुर॒भीणि॑ व्यन्तु ॥१८॥
imo agne vītatamāni havyājasro vakṣi devatātim accha | prati na īṁ surabhīṇi vyantu ||
इ॒मो इति॑। अ॒ग्ने॒। वी॒तऽत॑मानि। ह॒व्या। अज॑स्रः। व॒क्षि॒। दे॒वऽता॑तिम्। इच्छ॑। प्रति॑। नः॒। ई॒म्। सु॒र॒भीणि॑। व्य॒न्तु॒ ॥१८॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्यों को क्या प्राप्त करना चाहिये, इस विषय को अगले मन्त्र में कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
नित्य यज्ञ द्वारा सुरभि पदार्थों का सब देवों में पहुँचना
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्यैः किं प्राप्तव्यमित्याह ॥
हे अग्ने ! येनाऽजस्नो देवतातिमच्छ वक्ष्यनेन न इमो सुरभीणि वीततमानि हव्या च नः प्रति ईं व्यन्तु ॥१८॥
