य उ॒ग्रइ॑व शर्य॒हा ति॒ग्मशृ॑ङ्गो॒ न वंस॑गः। अग्ने॒ पुरो॑ रु॒रोजि॑थ ॥३९॥
ya ugra iva śaryahā tigmaśṛṅgo na vaṁsagaḥ | agne puro rurojitha ||
यः। उ॒ग्रःऽइ॑व। श॒र्य॒ऽहा। ति॒ग्मऽशृ॑ङ्गः। न। वंस॑ऽगः। अग्ने॑। पुरः॑। रु॒रोजि॑थ ॥३९॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
फिर मनुष्यों को क्या करना चाहिये, इस विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
आसुर पुरियों का विदारण
स्वामी दयानन्द सरस्वती
पुनर्मनुष्यैः किं कर्त्तव्यमित्याह ॥
हे अग्ने यस्त्वं वंसगः शर्यहा तिग्मशृङ्गो न शत्रूणां पुर उग्रइव रुरोजिथ तं वयं सत्कुर्याम ॥३९॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
What should men do is again told.
O king! shining like the fire, we honor you as you are of righteous dealing. slayer of the wicked persons who must be slayed, full of splendor like the sun whose rays are sharp like the horns of a bull and break the might of the foes being fierce to them.
