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न्य१॒॑ग्निं जा॒तवे॑दसं होत्र॒वाहं॒ यवि॑ष्ठ्यम्। दधा॑ता दे॒वमृ॒त्विज॑म् ॥७॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ny agniṁ jātavedasaṁ hotravāhaṁ yaviṣṭhyam | dadhātā devam ṛtvijam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

नि। अ॒ग्निम्। जा॒तऽवे॑दसम्। हो॒त्र॒ऽवाह॑म्। यवि॑ष्ठ्यम्। दधा॑त। दे॒वम्। ऋ॒त्विज॑म् ॥७॥

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ऋग्वेद » मण्डल:5» सूक्त:26» मन्त्र:7 | अष्टक:4» अध्याय:1» वर्ग:20» मन्त्र:2 | मण्डल:5» अनुवाक:2» मन्त्र:7


स्वामी दयानन्द सरस्वती

अब अग्निधारणविषय को कहते हैं ॥

पदार्थान्वयभाषाः - हे मनुष्यो ! आप लोग (यविष्ठ्यम्) अतिशयित युवा जनों में प्रसिद्ध हुए (ऋत्विजम्) यज्ञसाधक और (देवम्) दिव्य गुणवाले के सदृश (जातवेदसम्) उत्पन्न हुए पदार्थों में विद्यमान (होत्रवाहम्) हवन की हुई वस्तुओं को धारण करनेवाले (अग्निम्) अग्नि को (नि, दधाता) निरन्तर धारण करो ॥७॥
भावार्थभाषाः - जैसे शिल्पविद्या के जाननेवाले जन अपने कार्य्य को सिद्ध करते हैं, वैसे ही अग्नि आदि भी कार्य की सिद्धि करते हैं ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु का धारण

पदार्थान्वयभाषाः - १. (अग्निम्) = उस अग्रगति के साधक (जातवेदसम्) = ज्ञान को हमारे में प्रादुर्भूत करनेवाले [जातः वेदः यस्मात्] (होत्रवाहम्) = हमारे सब यज्ञों का वहन करनेवाले, (यविष्ठ्यम्) = हमारे से बुराइयों को अधिक-से-अधिक दूर करनेवाले व अच्छाइयों को हमारे साथ मिलानेवाले प्रभु को (नि दधात) = अपने हृदयमन्दिरों में स्थापित करो। २. उस प्रभु को हृदय में आसीन करो जो कि (देवम्) = प्रकाशमय हैं तथा (ऋत्विजम्) = ऋतु-ऋतु में— समय-समय पर अर्थात् सदा यजनीय [उपासनीय] हैं। यह प्रभु का उपासन ही हमारे जीवनों को उत्तम बनाता है। आसीन करें। ये हमारे जीवनों को प्रगतिवाला
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु को अपने हृदयों में ज्ञानयुक्त-यज्ञमय बनाएँगे।

स्वामी दयानन्द सरस्वती

अथाग्निधारणविषयमाह ॥

अन्वय:

हे मनुष्या ! यूयं यविष्ठ्यमृत्विजं देवमिव जातवेदसं होत्रवाहमग्निं नि दधाता ॥७॥

पदार्थान्वयभाषाः - (नि) (अग्निम्) पावकम् (जातवेदसम्) जातेषु विद्यमानम् (होत्रवाहम्) यो होत्राणि हुतानि द्रव्याणि वहति (यविष्ठ्यम्) योऽतिशयितेषु युवसु भवम् (दधाता) धरत। अत्र संहितायामिति दीर्घः। (देवम्) दिव्यगुणम् (ऋत्विजम्) यज्ञसाधकम् ॥७॥
भावार्थभाषाः - यथा शिल्पिनः स्वकार्य्यं साध्नुवन्ति तथैवाग्न्यादयोऽपि कार्य्यसिद्धिं कुर्वन्ति ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Hold on to Agni, light and fire of life, pervasive in all things in existence, bearer of yajna fragrance, most youthful energy, and divine yajaka of nature and humanity.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

Upholding of Agni is told.

अन्वय:

O men! uphold or methodically utilize Agni (energy or electricity) which exists in many objects and is conveyor of the oblations to distant places. Like the performer of the Yajna you are well-known among the young and are endowed with the divine virtues.

भावार्थभाषाः - The artists accomplish their works, and so do the energy and electricity, etc. and accomplish many purposes.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - जसे शिल्पीजन (कारागीर) स्वतःचे कार्य करतात तसाच अग्नी इत्यादीही कार्यसिद्धी करतात. ॥ ७ ॥