प्रा॒तर॒ग्निः पु॑रुप्रि॒यो वि॒शः स्त॑वे॒ताति॑थिः। विश्वा॑नि॒ यो अम॑र्त्यो ह॒व्या मर्ते॑षु॒ रण्य॑ति ॥१॥
prātar agniḥ purupriyo viśaḥ stavetātithiḥ | viśvāni yo amartyo havyā marteṣu raṇyati ||
प्रा॒तः। अ॒ग्निः। पु॒रु॒ऽप्रि॒यः। वि॒शः। स्त॒वे॒त॒। अति॑थिः। विश्वा॑नि। यः। अम॑र्त्यः। ह॒व्या। मर्ते॑षु। रण्य॑ति ॥१॥
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अब पाँच ऋचावाले अठारहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के सदृश अतिथि के विषय को कहते हैं ॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
प्रभु पूजन से दिन का प्रारम्भ
स्वामी दयानन्द सरस्वती
अथाग्निवदतिथिविषयमाह ॥
हे मनुष्या ! योऽग्निरिव पुरुप्रियो मर्त्तेष्वमर्त्यो रण्यति विश्वानि हव्या स्तवेत यः प्रातरारभ्य विश उपदिशेत् सोऽतिथिः पूजनीयो भवति ॥१॥
डॉ. तुलसी राम
आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड
O men ! guest is venerable who is purifier like the fire, is liked and loved and served by many. Being immortal by the nature of his soul, he takes delight in good (ever though perishable) deeds; showers his praises over all things that are worth giving, and delivers sermons to the people from morning (till night).
माता सविता जोशी
(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)या सूक्तात अग्नीप्रमाणे अतिथींच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.
