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प्रा॒तर॒ग्निः पु॑रुप्रि॒यो वि॒शः स्त॑वे॒ताति॑थिः। विश्वा॑नि॒ यो अम॑र्त्यो ह॒व्या मर्ते॑षु॒ रण्य॑ति ॥१॥

English Transliteration

prātar agniḥ purupriyo viśaḥ stavetātithiḥ | viśvāni yo amartyo havyā marteṣu raṇyati ||

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Pad Path

प्रा॒तः। अ॒ग्निः। पु॒रु॒ऽप्रि॒यः। वि॒शः। स्त॒वे॒त॒। अति॑थिः। विश्वा॑नि। यः। अम॑र्त्यः। ह॒व्या। मर्ते॑षु। रण्य॑ति ॥१॥

Rigveda » Mandal:5» Sukta:18» Mantra:1 | Ashtak:4» Adhyay:1» Varga:10» Mantra:1 | Mandal:5» Anuvak:2» Mantra:1


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अब पाँच ऋचावाले अठारहवें सूक्त का प्रारम्भ है, उसके प्रथम मन्त्र में अग्नि के सदृश अतिथि के विषय को कहते हैं ॥

Word-Meaning: - हे मनुष्यो ! (यः) जो (अग्निः) अग्नि के सदृश पवित्र (पुरुप्रियः) बहुतों से कामना किया वा सेवन किया गया (मर्त्तेषु) नाश होनेवाले कार्य्यों में (अमर्त्यः) स्वभाव से मरणधर्म्मरहित (रण्यति) रमता है (विश्वानि) सम्पूर्ण (हव्या) देने योग्यों की (स्तवेत) प्रशंसा करे और जो (प्रातः) प्रातःकाल के आरम्भ से (विशः) प्रजाओं को उपदेश देवे वह (अतिथिः) आदर करने योग्य यथार्थवक्ता विद्वान् सत्कार करने योग्य होता है ॥१॥
Connotation: - हे मनुष्यो ! जो अतिथि आत्मा का जाननेवाला, सत्य का उपदेशक, विद्वान्, विद्वानों का प्रिय, परमात्मा के सदृश सब के हित को चाहनेवाला नित्य क्रीड़ा करता है, वह ही सत्कार करने योग्य है ॥१॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

अथाग्निवदतिथिविषयमाह ॥

Anvay:

हे मनुष्या ! योऽग्निरिव पुरुप्रियो मर्त्तेष्वमर्त्यो रण्यति विश्वानि हव्या स्तवेत यः प्रातरारभ्य विश उपदिशेत् सोऽतिथिः पूजनीयो भवति ॥१॥

Word-Meaning: - (प्रातः) (अग्निः) अग्निरिव पवित्रः (पुरुप्रियः) बहुभिः कमितः सेवितो वा (विशः) प्रजाः (स्तवेत) प्रशंसेत् (अतिथिः) पूजनीय आप्तो विद्वान् (विश्वानि) (यः) (अमर्त्यः) स्वभावेन मरणधर्मरहितः (हव्या) दातुमर्हाणि (मर्तेषु) मरणधर्मेषु कार्य्येषु (रण्यति) रमते ॥१॥
Connotation: - हे मनुष्या ! योऽतिथिरात्मवित्सत्योपदेशको विद्वान् विद्वत्प्रियः परमात्मेव सर्वहितैषी नित्यं क्रीडते स एव सत्कर्त्तव्योऽस्ति ॥१॥
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MATA SAVITA JOSHI

या सूक्तात अग्नीप्रमाणे अतिथींच्या गुणांचे वर्णन असल्यामुळे या सूक्ताच्या अर्थाची पूर्वसूक्तार्थाबरोबर संगती जाणावी.

Word-Meaning: - N/A
Connotation: - हे माणसांनो ! जो अतिथी आत्म्याला जाणणारा, सत्योपदेशक विद्वान व विद्वानांना प्रिय, परमेश्वराप्रमाणे सर्वांचे हित इच्छिणारा, सदैव प्रसन्नतेने विहार करणारा असतो तोच सत्कार करण्यायोग्य असतो. ॥ १ ॥