वांछित मन्त्र चुनें
436 बार पढ़ा गया

ऋ॒तावा॑नं य॒ज्ञियं॒ विप्र॑मु॒क्थ्य१॒॑मा यं द॒धे मा॑त॒रिश्वा॑ दि॒वि क्षय॑म्। तं चि॒त्रया॑मं॒ हरि॑केशमीमहे सुदी॒तिम॒ग्निं सु॑वि॒ताय॒ नव्य॑से॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ṛtāvānaṁ yajñiyaṁ vipram ukthyam ā yaṁ dadhe mātariśvā divi kṣayam | taṁ citrayāmaṁ harikeśam īmahe sudītim agniṁ suvitāya navyase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

ऋ॒तऽवा॑नम्। य॒ज्ञिय॑म्। विप्र॑म्। उ॒क्थ्य॑म्। आ। यम्। द॒धे। मा॒त॒रिश्वा॑। दि॒वि। क्षय॑म्। तम्। चि॒त्रऽया॑मम्। हरि॑ऽकेशम्। ई॒म॒हे॒। सु॒ऽदी॒तिम्। अ॒ग्निम्। सु॒वि॒ताय॑। नव्य॑से॥

436 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:3» सूक्त:2» मन्त्र:13 | अष्टक:2» अध्याय:8» वर्ग:19» मन्त्र:3 | मण्डल:3» अनुवाक:1» मन्त्र:13


स्वामी दयानन्द सरस्वती

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

पदार्थान्वयभाषाः - (यम्) जिस (ऋतावानम्) सत्यकारणमय (यज्ञियम्) यज्ञसंपादक (उक्थ्यम्) प्रशंसा करने योग्य (दिवि, क्षयम्) दिव्य आकाश में निवास करते हुए (चित्रयामम्) चित्र-विचित्र अद्भुत प्रहर जिसमें होते हैं वा चित्र विचित्र याम प्राप्ति जिसकी वा (सुदीतिम्) सुन्दर दान जिससे होता उस (हरिकेशम्) हरणशील रश्मियोंवाले (अग्निम्) अग्नि को (नव्यसे) नवीन (सुविताय) अभिषव के लिये (मातरिश्वा) अन्तरिक्ष में सोनेवाला वायु (आ, दधे) अच्छे प्रकार धारण करता है (सम्) उसे जो जानता है उस (विप्रम्) मेधावी पुरुष को हम लोग (ईमहे) याचते हैं ॥१३॥
भावार्थभाषाः - अग्नि के निमित्त कारण को धारण करनेवाला वायु वर्त्तमान है, जिस अन्तरिक्ष में वायु है, वहीं अग्नि भी है, जिससे प्रलय होता वा यज्ञ सिद्ध होते हैं, उस अद्भुत गुण-कर्म-स्वभाववाले अग्नि को नवीनता और विद्या प्राप्ति के लिये विद्वान् जन ढूँढें ॥१३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मातरिश्वा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (ऋतावानम्) = ऋतवाले व ऋत का अवन [=रक्षण] करनेवाले प्राकृतिक संसार में काम करनेवाला नियम ऋत कहलाता है, प्रभु इस ऋत का रक्षण करते हैं, प्रभु की व्यवस्था में प्रत्येक पिण्ड ऋत के अनुसार गति कर रहा है। (यज्ञियम्) = पूज्य, संगतिकरण योग्य व समर्पणीय। (विप्रम्) = विशेषरूप से हमारा पूरण करनेवाले, (उक्थ्यम्) = स्तुत्य, (दिवि क्षयम्) = प्रकाशमय स्वरूप में निवास करनेवाले (यम्) = जिस ईश को (मातरिश्वा) = वेदमाता के अनुसार गति करनेवाला व वृद्धि प्राप्त करनेवाला जीव (दधे) = धारण करता है। (तम्) = उसी प्रभु की हम (ईमहे) = याचना करते हैं। प्रभु का यह उपासक भी ऋतरक्षण करनेवाला, यज्ञशील, अपना पूरण करनेवाला व स्तुतिमय जीवनवाला बनता है। [२] (तम्) = उस (चित्रयामम्) = अद्भुत गतिवाले उस प्रभु की गतियाँ जीव के लिये अज्ञेय हैं। (हरिकेशम्) = दुःख के हरण करनेवाली ज्ञानरश्मियोंवाले। (सु-दीतिम्) = उत्तम दीप्तिवाले (अग्निम्) = अग्रणी प्रभु को (नव्यसे) = अत्यन्त स्तुत्य (सुविताय) = सुवित के लिये ईमहे याचना करते हैं। प्रभुकृपा से हम प्रशस्त जीवन-मार्गवाले हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभुस्तवन करते हुए हम प्रशस्त जीवन-मार्ग का आक्रमण करें। प्रभु - धारण के लिये वेदानुकूल जीवनयापन का प्रयत्न करें। -

स्वामी दयानन्द सरस्वती

पुनस्तमेव विषयमाह।

अन्वय:

यं ऋतावानं यज्ञियमुक्थ्यं दिवि क्षयं चित्रयामं सुदीतिं हरिकेशमग्निं नव्यसे सुविताय मातरिश्वाऽऽदधे तं यो जानाति तं विप्रं वयमीमहे॥१३॥

पदार्थान्वयभाषाः - (ऋतावानम्) सत्यकारणमयम् (यज्ञियम्) यज्ञसंपादकम् (विप्रम्) मेधाविनम् (उक्थ्यम्) प्रशंसनीयम् (आ) (यम्) (दधे) दधाति (मातरिश्वा) यो मातर्य्यन्तरिक्षे श्वसिति (दिवि) दिव्ये आकाशे (क्षयम्) निवसितारम् (तम्) (चित्रयामम्) चित्रा अद्भुता यामाः प्रहरा यस्मात् यद्वा चित्रं यामं प्रापणं यस्य तम् (हरिकेशम्) हरयो हरणशीलाः केशा रश्मयो यस्य तम् (ईमहे) याचामहे (सुदीतिम्) सुष्ठु दीतिः क्षयो यस्मात् तम् (अग्निम्) पावकम् (सुविताय) अभिषवाय (नव्यसे) नूतनाय ॥१३॥
भावार्थभाषाः - वह्नेर्निमित्तकारणं धर्ता वायुः प्रवर्त्तते यत्रान्तरिक्षे वायुरस्ति तत्रैव पावकः। यस्मात्प्रलयः प्रभवति येन च यज्ञाः सिद्धा भवन्ति तमद्भुतगुणकर्मस्वभावमग्निं नवीनताविद्याफलाप्तये विद्वांसोऽन्विच्छन्तु ॥१३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That Agni, Vaishvanara, universal fire of life, going by the ways of Truth and universal Law, venerable, intelligent, admirable, existing and operating in the lights of spaces, which is held and sustained by the universal Vayu energy, that same Agni, wonderful in movement and achievement, bright in flames, radiant with holy light, we love, admire and worship for the sake of latest success and well-being.

आचार्य धर्मदेव विद्या मार्तण्ड

The subject of fire is further narrated.

अन्वय:

We implore for Divine Commands and praiseworthy wealth from that wise man who knows the nature and properties of the Agni (fire). It is born out of true eternal cause (matter) and is the means of performing Yajnas. It is admirable, because the wind moving in the firmament and the sky upholds. It makes us dwell in wonderful happiness. Properly utilized, it has charming flames and is well consuming.

भावार्थभाषाः - The wind is the exciting cause and upholder of the fire. Where there is wind, it blazes fire. This fire is the cause of dissolution and the accomplishment of the Yajnas. So learned scientists should investigate the properties of this wonderful fire well to discover new secrets of this science.

माता सविता जोशी

(यह अनुवाद स्वामी दयानन्द सरस्वती जी के आधार पर किया गया है।)
भावार्थभाषाः - अग्नीचे निमित्त कारण धर्ता वायू असतो. ज्या अंतरिक्षात वायू असतो तेथे अग्नीही असतो. त्यामुळे प्रलयही होतो व यज्ञही सिद्ध होतात. नवीनतेसाठी व विद्याप्राप्तीसाठी विद्वानांनी त्या अद्भुत गुण, कर्म, स्वभावाच्या अग्नीचे संशोधन करावे. ॥ १३ ॥