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ऋ॒तावा॑नं य॒ज्ञियं॒ विप्र॑मु॒क्थ्य१॒॑मा यं द॒धे मा॑त॒रिश्वा॑ दि॒वि क्षय॑म्। तं चि॒त्रया॑मं॒ हरि॑केशमीमहे सुदी॒तिम॒ग्निं सु॑वि॒ताय॒ नव्य॑से॥

English Transliteration

ṛtāvānaṁ yajñiyaṁ vipram ukthyam ā yaṁ dadhe mātariśvā divi kṣayam | taṁ citrayāmaṁ harikeśam īmahe sudītim agniṁ suvitāya navyase ||

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Pad Path

ऋ॒तऽवा॑नम्। य॒ज्ञिय॑म्। विप्र॑म्। उ॒क्थ्य॑म्। आ। यम्। द॒धे। मा॒त॒रिश्वा॑। दि॒वि। क्षय॑म्। तम्। चि॒त्रऽया॑मम्। हरि॑ऽकेशम्। ई॒म॒हे॒। सु॒ऽदी॒तिम्। अ॒ग्निम्। सु॒वि॒ताय॑। नव्य॑से॥

Rigveda » Mandal:3» Sukta:2» Mantra:13 | Ashtak:2» Adhyay:8» Varga:19» Mantra:3 | Mandal:3» Anuvak:1» Mantra:13


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SWAMI DAYANAND SARSWATI

फिर उसी विषय को अगले मन्त्र में कहा है।

Word-Meaning: - (यम्) जिस (ऋतावानम्) सत्यकारणमय (यज्ञियम्) यज्ञसंपादक (उक्थ्यम्) प्रशंसा करने योग्य (दिवि, क्षयम्) दिव्य आकाश में निवास करते हुए (चित्रयामम्) चित्र-विचित्र अद्भुत प्रहर जिसमें होते हैं वा चित्र विचित्र याम प्राप्ति जिसकी वा (सुदीतिम्) सुन्दर दान जिससे होता उस (हरिकेशम्) हरणशील रश्मियोंवाले (अग्निम्) अग्नि को (नव्यसे) नवीन (सुविताय) अभिषव के लिये (मातरिश्वा) अन्तरिक्ष में सोनेवाला वायु (आ, दधे) अच्छे प्रकार धारण करता है (सम्) उसे जो जानता है उस (विप्रम्) मेधावी पुरुष को हम लोग (ईमहे) याचते हैं ॥१३॥
Connotation: - अग्नि के निमित्त कारण को धारण करनेवाला वायु वर्त्तमान है, जिस अन्तरिक्ष में वायु है, वहीं अग्नि भी है, जिससे प्रलय होता वा यज्ञ सिद्ध होते हैं, उस अद्भुत गुण-कर्म-स्वभाववाले अग्नि को नवीनता और विद्या प्राप्ति के लिये विद्वान् जन ढूँढें ॥१३॥
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SWAMI DAYANAND SARSWATI

पुनस्तमेव विषयमाह।

Anvay:

यं ऋतावानं यज्ञियमुक्थ्यं दिवि क्षयं चित्रयामं सुदीतिं हरिकेशमग्निं नव्यसे सुविताय मातरिश्वाऽऽदधे तं यो जानाति तं विप्रं वयमीमहे॥१३॥

Word-Meaning: - (ऋतावानम्) सत्यकारणमयम् (यज्ञियम्) यज्ञसंपादकम् (विप्रम्) मेधाविनम् (उक्थ्यम्) प्रशंसनीयम् (आ) (यम्) (दधे) दधाति (मातरिश्वा) यो मातर्य्यन्तरिक्षे श्वसिति (दिवि) दिव्ये आकाशे (क्षयम्) निवसितारम् (तम्) (चित्रयामम्) चित्रा अद्भुता यामाः प्रहरा यस्मात् यद्वा चित्रं यामं प्रापणं यस्य तम् (हरिकेशम्) हरयो हरणशीलाः केशा रश्मयो यस्य तम् (ईमहे) याचामहे (सुदीतिम्) सुष्ठु दीतिः क्षयो यस्मात् तम् (अग्निम्) पावकम् (सुविताय) अभिषवाय (नव्यसे) नूतनाय ॥१३॥
Connotation: - वह्नेर्निमित्तकारणं धर्ता वायुः प्रवर्त्तते यत्रान्तरिक्षे वायुरस्ति तत्रैव पावकः। यस्मात्प्रलयः प्रभवति येन च यज्ञाः सिद्धा भवन्ति तमद्भुतगुणकर्मस्वभावमग्निं नवीनताविद्याफलाप्तये विद्वांसोऽन्विच्छन्तु ॥१३॥
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MATA SAVITA JOSHI

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Connotation: - अग्नीचे निमित्त कारण धर्ता वायू असतो. ज्या अंतरिक्षात वायू असतो तेथे अग्नीही असतो. त्यामुळे प्रलयही होतो व यज्ञही सिद्ध होतात. नवीनतेसाठी व विद्याप्राप्तीसाठी विद्वानांनी त्या अद्भुत गुण, कर्म, स्वभावाच्या अग्नीचे संशोधन करावे. ॥ १३ ॥