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त्वां पूर्व॒ ऋष॑यो गी॒र्भिरा॑य॒न्त्वाम॑ध्व॒रेषु॑ पुरुहूत॒ विश्वे॑ । स॒हस्रा॒ण्यधि॑रथान्य॒स्मे आ नो॑ य॒ज्ञं रो॑हिद॒श्वोप॑ याहि ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

tvām pūrva ṛṣayo gīrbhir āyan tvām adhvareṣu puruhūta viśve | sahasrāṇy adhirathāny asme ā no yajñaṁ rohidaśvopa yāhi ||

पद पाठ

त्वाम् । पूर्वे॑ । ऋष॑यः । गीः॒ऽभिः । आ॒य॒न् । त्वाम् । अ॒ध्व॒रेषु॑ । पु॒रु॒ऽहू॒त॒ । विश्वे॑ । स॒हस्रा॑णि । अधि॑ऽरथानि । अ॒स्मे इति॑ । आ । नः॒ । य॒ज्ञम् । रि॒हि॒त्ऽअ॒श्वा । उप॑ । या॒हि॒ ॥ १०.९८.९

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:98» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:13» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:9


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुहूत) हे बहुत प्रकार से आमन्त्रण करने योग्य (रोहिदश्व) तेजोधर्म से व्याप्त परमात्मन् ! (त्वाम्) तुझे (पूर्वे) पुरातन (ऋषयः) वैदिक ऋषि परमर्षि (गीर्भिः) स्तुतियों से (आयन्) प्राप्त हुए हैं (विश्वे) अन्य सब विद्वान् (अध्वरेषु) भिन्न-भिन्न यज्ञों में आमन्त्रित करते हैं (अस्मे) हमारे लिए (सहस्राणि) बहुत (अधिरथानि) रमणीय मोक्षसम्बन्धी धनसाधनों को प्रदान कर (नः) हमारे (यज्ञम्) श्रेष्ठतम कर्म के प्रति (उप-आ-याहि) प्राप्त हो, उसे उपयोगी बना ॥९॥
भावार्थभाषाः - पुरातन वैदिक महर्षियों ने इसकी स्तुतियों के द्वारा उसे तथा उसके वेदज्ञान को प्राप्त किया, अन्य अर्वाचीन सब ऋषि भी भिन्न-भिन्न यज्ञों में उसे आमन्त्रित करते हैं, वह मोक्षसम्बन्धी रमणीय भोगों को प्रदान करता है ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

जीवन-यज्ञ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (पुरुहूत) = बहुतों से पुकारे जानेवाले प्रभो ! [ पुरु = बहुत] पालक व पूरक है पुकार जिसकी ऐसे प्रभो! [पृपालनपूरणयोः] (त्वाम्) = आपको (पूर्वे) = अपना पालन व पूरण करनेवाले (ऋषयः) = ज्ञानी पुरुष (गीर्भिः) = इन ज्ञान की वाणियों के द्वारा (आयन्) = प्राप्त होते हैं। (विश्वे) = इस संसार में प्रविष्ट होनेवाले व्यक्ति (अध्वरेषु) = हिंसारहित यज्ञात्मक कर्मों के होने पर (त्वाम्) = आपको प्राप्त होते हैं। [२] हे प्रभो! आपको प्राप्त होने पर (अस्मे) = हमें (अधिरथानि) = इस शरीररूप रथ में (सहस्राणि) = हजारों ऐश्वर्य प्राप्त होते हैं। इसलिए हे (रोहिदश्व) = तेजस्वी वृद्धिशील इन्द्रियाश्वों को प्राप्त करानेवाले प्रभो ! आप (नः यज्ञम्) = हमारे जीवनयज्ञ में (उप आयाहि) = समीपता से प्राप्त होइये । आपकी कृपा से ही तो हमारा यह जीवनयज्ञ पूर्ण होना है। 'कर्णाविमौ नासिके चक्षणी मुखम्' इन सात होताओं से ही तो यह जीवनयज्ञ चलता है। इन सातों को आपने ही तेजस्विता प्राप्त करानी है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-ज्ञान व यज्ञ प्रभु प्राप्ति के साधन हैं। प्रभु के प्राप्त होने पर ही हमारा जीवनयज्ञ निर्विघ्नता से पूर्ण होना है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरुहूत रोहिदश्व) हे बहुप्रकारेणामन्त्रणीय तेजोव्यापिन् परमात्मन् ! (त्वां पूर्वे विश्वे ऋषयः-गीर्भिः-आयन्) त्वां प्राक्तना वैदिकर्षयः परमर्षयः स्तुतिभिः प्राप्तवन्तः (विश्वे-अध्वरेषु) अन्ये सर्वे विद्वांसः भिन्नभिन्नयज्ञेषु त्वामाह्वयन्ति (अस्मे) अस्मभ्यं (सहस्राणि-अधिरथानि) बहूनि रमणीयं मोक्षमधिकृत्य धनानि साधनानि प्रयच्छेति शेषः (नः-यज्ञम्-उपायाहि) अस्माकं श्रेष्ठतमं कर्म प्रति खलूपागच्छोपयुक्तं कुरु ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, universally invoked and adored yajnic power and showers of rain, saints and seers of the world of all time approached you with songs of adoration and prayer in yajna. O lord of red flames and thunderous voice, pray visit our yajna and grant us a thousandfold gifts overflowing our chariots of life.