उत्तर समुद्र से अधर समुद्र की ओर दिव्य जलों का प्रवाह
पदार्थान्वयभाषाः - [१] 'ऋष' धातु 'नष्ट करना' इस अर्थ की वाचक है। 'वासनाओं को नष्ट करनेवाली है इन्द्रिय, मन व बुद्धिरूप सेना जिसकी' वह व्यक्ति 'आर्ष्टिषेण' है। यह (आर्ष्टिषेण:) = आर्ष्टिण (ऋषिः) = वासनाओं का संहार करनेवाला बनकर (होत्रं निषीदन्) = [होत्रम्] स्तवन में व यज्ञों में आसीन होता है। इस स्तवन व यज्ञशीलता से (देवापिः) = [देवाः आपयो यस्य] देवों का मित्र बनकर देवसुमतिं चिकित्वान् देवों की कल्याणी मति को जाननेवाला होता है। देवों के सम्पर्क में आकर उत्तम ज्ञान को प्राप्त करता है। माता, पिता व आचार्य आदि देव उसके ज्ञान को बढ़ानेवाले होते हैं। [२] (सः) = वह आर्ष्टिषेण देवापि (उत्तरस्मात्) [समुद्रात् ] = उत्कृष्ट ज्ञान समुद्रभूत आचार्यों से (अधरं समुद्रं अभि) = इस निचले समुद्र की ओर, अर्थात् अपनी ओर (दिव्याः अपः) = इन प्रकाशरूप अलौकिक ज्ञान जलों को असृजत् प्रवाहित करता है। ये ज्ञानजल (वर्ष्या:) = सब सुखों का वर्षण करनेवाले होते हैं, ज्ञानजलों के आधार होने के दृष्टिकोण से आचार्य 'उत्तर समुद्र' है और विद्यार्थी 'अधर समुद्र' । आचार्य से विद्यार्थी को ज्ञान प्राप्त होता है, यही उत्तर समुद्र से अधर समुद्र की ओर जल का बरसना है। ये ज्ञानजल दिव्य हैं, प्रकाशमय होने से अलौकिक हैं और सुखों का वर्षण करनेवाले होने से 'वर्ष्य' हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - हम इन्द्रियों, मन व बुद्धि को वासनाओं के संहार के लिए प्रेरित करें। आचार्यों के सम्पर्क में आकर ज्ञानजलों के समुद्र बनने का यत्न करें।