पदार्थान्वयभाषाः - [१] देवापि प्रार्थना करता है कि (नः) = हमारे में (मधुमन्तः) = जीवन को अत्यन्त मधुर बनानेवाले (द्रप्साः) = सोमकण (आविशन्तु) = हमारे शरीरों में ही चारों ओर प्रविष्ट होनेवाले हों। हे (इन्द्र) = परमैश्वर्यशालिन् प्रभो ! आप हमें (अधिरथम्) = इस शरीर - रथ में (सहस्त्रं देहि) = शतशः धनों को प्राप्त कराइये । [२] देवापि की इस प्रार्थना को सुनकर प्रभु उसे इसकी प्राप्ति के लिए साधनभूत बातों का निर्देश करते हुए कहते हैं कि - [क] (होत्रं निषीद) = स्तुति [होत्र - .... ] में तू आसीन होनेवाला हो, सदा उपासना तुझे प्रिय हो । [ख] (ऋतुथा यजस्व) = ऋतुओं के अनुसार तू यज्ञों को करनेवाला बन । [ग] तथा (देवापे) = हे देवों को अपना मित्र बनानेवाले जीव ! तू (देवान्) = देवों का (हविषा) = दानपूर्वक अदन करने के द्वारा, यज्ञशेष के सेवन के द्वारा (सपर्य) = पूजन करनेवाला हो । यज्ञों [पितृयज्ञ, अतिथियज्ञ] के द्वारा देवों को तृप्त करके ही तू सदा खानेवाला बन। इन प्रसन्न हुए- हुए देवों से ही तुझे वाञ्छनीय ज्ञान की प्राप्ति होगी ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- जीवन में वास्तविक ऐश्वर्य को पाने के लिए आवश्यक है कि हम - प्रभु-स्तवन करें, [२] यज्ञशील हों, [३] यज्ञशेष के सेवन की वृत्तिवाले बनकर देवों को आदृत करनेवाले बनें।