वांछित मन्त्र चुनें
1917 बार पढ़ा गया

पुरू॑रवो॒ मा मृ॑था॒ मा प्र प॑प्तो॒ मा त्वा॒ वृका॑सो॒ अशि॑वास उ क्षन् । न वै स्त्रैणा॑नि स॒ख्यानि॑ सन्ति सालावृ॒काणां॒ हृद॑यान्ये॒ता ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

purūravo mā mṛthā mā pra papto mā tvā vṛkāso aśivāsa u kṣan | na vai straiṇāni sakhyāni santi sālāvṛkāṇāṁ hṛdayāny etā ||

पद पाठ

पुरू॑रवः । मा । मृ॒थाः॒ । मा । प्र । प॒प्तः॒ । मा । त्वा॒ । वृका॑सः । अशि॑वासः । ऊँ॒ इति॑ । क्ष॒न् । न । वै । स्त्रैणा॑नि । स॒ख्यानि॑ । स॒न्ति॒ । सा॒ला॒वृ॒काणा॑म् । हृद॑यानि । ए॒ता ॥ १०.९५.१५

1917 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:95» मन्त्र:15 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:3» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:15


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरूरवः) हे बहुवादी ! (मा मृथाः) मत मर (मा प्र पप्तः) मत कहीं खड्डे आदि में प्रपतन कर-गिर, (मा त्वा) मत मुझे (अशिवासः) अहितकर (वृकासः) भेडिएँ मांसभक्षक (उ क्षन्) अवश्य खा जावें (न वै) न ही (स्त्रैणानि) स्त्रीसम्बन्धी (सख्यानि) सखी भाव-स्नेह (सन्ति) स्थिर होते हैं अर्थात् कल्याणकर नहीं होते हैं (एता) ये तो (सालावृकाणाम्) वेग से आक्रमण करनेवाले भेड़ियों के (हृदयानि) हृदय कैसे क्रूर हैं-हानिकर हैं ॥१५॥
भावार्थभाषाः - मनुष्य कामी बनकर आत्महत्या कर लेते हैं, अपने को मांस खानेवाले पशुओं तक समर्पित कर देते हैं, ऐसा नहीं करऩा चाहिए, यह जीवन की सफलता नहीं और स्त्रियों में आसक्ति से कामवश स्नेह स्थायी नहीं होते हैं, अपितु आक्रमणकारी भेड़ियों के हृदय जैसे जीवन नष्ट करानेवाले होते हैं, किन्तु  सद्गृहस्थ बनकर पुत्र उत्पत्ति-पुत्रोत्पादन का लक्ष्य रखें ॥१५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उर्वशी का उपालम्भ

पदार्थान्वयभाषाः - [१] पुरुरवा की शपथें सुनकर उर्वशी कहती है कि हे (पुरुरवा:) = बहुत बात करनेवाले [रु शब्दे ] (मा मृथाः) = आप मरिये नहीं । (मा प्रपप्तः) = दुर्गति में भी न गिरिये । (उ) और (त्वा) = आपको (अशिवासः) = अकल्याणकारी (वृकासः) = भेड़िये (माक्षन्) = मत खायें। आपको ऐसी आपत्तियाँ क्यों आयें ? [२] कुछ उपालाम्भ के स्वर में उर्वशी कहती है कि (स्त्रैणानि सख्यानि) = स्त्रियों की मित्रताएँ तो (वै) = निश्चय से (न सन्ति) = होती ही नहीं। ('एता') = ये तो (हृदयानि) = हृदय (सालावृकाणाम्) = बन्दरों के हैं, अर्थात् अत्यन्त चंचल हैं' ये शब्द उर्वशी अपने हृदय की ओर इशारा करती हुई कहती है । [३] वस्तुतः उर्वशी को कहीं से ऐसा सुन पड़ा कि पुरुरवा ऐसा कहते थे कि 'स्त्रियों की क्या मित्रता, ये तो बड़े चञ्चल हृदय की होती हैं'। बस तभी से उर्वशी का मन फट गया। अन्य घटनाएँ भी उसे इसी विचार की पोषक प्रतीत हुईं और वह अपने मातृगृह को चली गई।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- 'पत्नी के विषय में किसी अन्य व्यक्ति से आलोचनात्मक शब्द कहना' वैमनस्य का सबसे बड़ा कारण होता है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पुरूरवः-मा मृथाः) हे बहुवादिन् ! त्वं न म्रियस्व (मा प्र पप्तः) न क्वचित् प्रपतनं कुरु (मा त्वा-अशिवासः-वृकासः-उ क्षन्) न त्वामहितकरा वृका मांसभक्षकाः पशवो भक्षयेयुः, “घस्लृ भक्षणे अस्य लुङि रूपम्” यतः (न वै स्त्रैणानि सख्यानि सन्ति) न निश्चयेन स्त्रीसम्बन्धीनि सख्यानि स्थिराणि कल्याणकराणि भवन्ति, (एता सालावृकाणां हृदयानि) इमानि सख्यानि तु गतिशीलच्छेदकानाम् “षल गतौ” [भ्वादि०] कर्त्तरि णः प्रत्ययश्छान्दसः ‘सालाश्च ते-वृकाश्च सालवृकाः’ तेषां पशूनां हृदयानि-इव दुःखदायीनि भवन्ति ॥१५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Pururava, let this never be: do not die, never fall, never must cursed wolves devour you, such are not the loves and friendships of women. It is only women of wolfish heart that deceive and betray the covenant.