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बृ॒हद्व॑दन्ति मदि॒रेण॑ म॒न्दिनेन्द्रं॒ क्रोश॑न्तोऽविदन्न॒ना मधु॑ । सं॒रभ्या॒ धीरा॒: स्वसृ॑भिरनर्तिषुराघो॒षय॑न्तः पृथि॒वीमु॑प॒ब्दिभि॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

bṛhad vadanti madireṇa mandinendraṁ krośanto vidann anā madhu | saṁrabhyā dhīrāḥ svasṛbhir anartiṣur āghoṣayantaḥ pṛthivīm upabdibhiḥ ||

पद पाठ

बृ॒हत् । व॒द॒न्ति॒ । म॒दि॒रेण॑ । म॒न्दिना॑ । इन्द्र॑म् । क्रोश॑न्तः । अ॒वि॒द॒न् । अ॒ना । मधु॑ । स॒म्ऽरभ्य॑ । धीराः॑ । स्वसृ॑ऽभिः । अ॒न॒र्ति॒षुः॒ । आ॒ऽघो॒षय॑न्तः । पृ॒थि॒वीम् । उ॒प॒ब्दिऽभिः॑ ॥ १०.९४.४

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:94» मन्त्र:4 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:29» मन्त्र:4 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:4


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मधु-अविदन्) विद्वान् जन परमात्मा के आनन्द मधु को जब प्राप्त करते हैं (अना-इन्द्रं क्रोशन्तः) मुख से परमात्मा को स्तुत करते हुए (मन्दिना-मदिरेण) स्तोतव्य प्रशंसनीय आनन्द से (बृहत्-वदन्ति) बहुत गुणगान करते हैं (धीराः-संरभ्य) बुद्धिमान् ज्ञान में संलग्न हुए (उपब्दिभिः) वाणियों से (पृथिवीम्) प्रथित जनसभा को (आघोषयन्तः) भलीभाँति पूरित करते हुए (स्वसृभिः) अङ्गुलियों द्वारा-अङ्गुलियों को फ़ैलाकर-खोलकर (अनर्तिषुः) नृत्य करते हैं ॥४॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् जन परमात्मा के आनन्दमधु को प्राप्त कर उसकी स्तुति करते हैं, उसके ध्यान में रत होकर गुणगान करते हुए आनन्द से नृत्य किया करते हैं ॥४॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

प्रभु स्तवन से पृथ्वी को गुञ्जित करना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] ये लोग (बृहद् वदन्ति) = खूब ही ज्ञानोपदेश करते हैं। (मदिरेण) = हर्ष से परिपूर्ण- उल्लासमय (मन्दिना) = [ shihing] दीप्त शब्दों से (इन्द्रं क्रोशन्तः) = परमैश्वर्यवाले प्रभु को पुकारते हुए (अना) = मुख से (मधु अविदन्) = मधु को प्राप्त करते हैं सदा मधुर ही शब्दों को बोलते हैं। प्रभु का स्तवन करनेवाला सभी को प्रभु पुत्र जानता हुआ कड़वा बोल ही नहीं सकता। [२] ये (धीराः) = ज्ञानी पुरुष (संरभ्या) = प्रभु का आश्रय करके (स्व-सृभिः) = आत्मतत्त्व की ओर ले जानेवाली गतियों से (अनर्तिषुः) = जीवन के नृत्य को करते हैं । प्रभु की प्रेरणाओं के अनुसार ही चलते हैं। [३] प्रभु प्रेरणाओं के अनुसार चलते हुए ये (पृथिवीम्) = इस पृथिवी को (उपब्दिभिः) = प्रभु के स्तवन के शब्दों से (आघोषयन्तः) = आघोषित करनेवाले होते हैं । इनके आश्रम प्रभु के गुणगान के शब्दों से गूँज उठते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - ज्ञानी पुरुष मधुर शब्दों में प्रभु का स्तवन करते हैं। प्रभु गुणगान से पृथ्वी को गुँजा देते हैं। इनके सारे काम इन्हें प्रभु की ओर ले जानेवाले होते हैं।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मधु-अविदन्) विद्वांसः परमात्मन आनन्दमधु यदा लभन्ते तदा (अना-इन्द्रं क्रोशन्तः) मुखेन परमात्मानं स्तुवन्तः शब्दयन्तः “क्रोशतेः शब्दकर्मणः” [निरु० २।२५] (मन्दिना-मदिरेण बृहद् वदन्ति) स्तुत्येन प्रशंसनीयेन “मन्दी मन्दतेः स्तुतिकर्मणः” [निरु० ४।२४] हर्षेण बहु वदन्ति (धीराः-संरभ्य) धीमन्तः ध्याने संरब्धाः संज्ञानाः सन्तः (उपब्दिभिः पृथिवीम्-आघोषयन्तः) वाग्भिः “उपब्दिः-वाङ्नाम” [निघ० १।११] पृथिवीं प्रथितां जनसभां समन्तात् पूरयन्तः (स्वसृभिः-अनर्तिषुः) अङ्गुलीभिः-अङ्गुलीः प्रसार्य “स्वसारः-अङ्गुलीनाम” [निघ० २।५] नृत्यन्ति ॥४॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - They speak wide and bold, exalt Indra with joy in words of ecstasy, tasting, knowing and proclaiming sweets of honey by music of the tongue. Having experienced and enjoyed the taste of sweetness repeatedly, the veterans express the ecstasy in dance with gestures, movements and expressions, the earth resounding with the music of their joy.