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विश्वे॑षामिरज्यवो दे॒वानां॒ वार्म॒हः । विश्वे॒ हि वि॒श्वम॑हसो॒ विश्वे॑ य॒ज्ञेषु॑ य॒ज्ञिया॑: ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

viśveṣām irajyavo devānāṁ vār mahaḥ | viśve hi viśvamahaso viśve yajñeṣu yajñiyāḥ ||

पद पाठ

विश्वे॑षाम् । इ॒र॒ज्य॒वः॒ । दे॒वाना॑म् । वाः । म॒हः । विश्वे॑ । हि । वि॒श्वऽम॑हसः । विश्वे॑ । य॒ज्ञेषु॑ । य॒ज्ञियाः॑ ॥ १०.९३.३

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:93» मन्त्र:3 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:26» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:3


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वेषाम्) सबके (इरज्यवः) स्वामिभूत दिव्य जनो ! या दिव्यपदार्थो ! (देवानाम्) तुम देवों का (महः-वाः) महान् वरने योग्य ज्ञान है (विश्वे हि) सब ही (विश्वमहसः) सब महत्त्ववाले (यज्ञेषु यज्ञियाः) यज्ञप्रसङ्गों में सत्करणीय हो ॥३॥
भावार्थभाषाः - ऊँचे विद्वानों और दिव्य पदार्थों में बहुत गुण होते हैं, उनसे लाभ लेना चाहिये ॥३॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

देवों के लक्षण

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार देवों का पूजन करनेवाला भी देव बनता है । सो देवों के लक्षण प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं। ये देव (विश्वेषाम्) = शरीर में साधनरूप से प्राप्त करायी गयी इन्द्रियों के, मन के व बुद्धि के इन शरीर में प्रविष्ट सब साधनों के ये (इरज्यवः) = स्वामी होते हैं, इनके वशीकरण से ही तो सब साध्यों को ये सिद्ध कर पाते हैं । [२] इन साधनों के ठीक प्रयोग करने से ही (देवानाम्) = इन देवों का (महः वाः) = महान् वरणीय धन होता है। ये उचित साधनों से खूब ही ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं । [३] (विश्वे हि) = ये सब देव निश्चय से (विश्वमहसः) = सम्पूर्ण तेजोंवाले होते हैं। [४] (विश्वे) = ये सब (यज्ञेषु यज्ञियाः) = सदा उत्तम यज्ञों में प्रवृत्त रहनेवाले होते हैं । उत्तम कर्मों में सदा व्यापृत रहते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- देवों के लक्षण ये हैं- [क] इन्द्रियों, मन व बुद्धि के ये स्वामी होते हैं [हृषीकेश], [ख] महान् वरणीय धन का अर्जन करते हैं, [ग] तेजस्वी होते हैं, [घ] यज्ञों में लगे रहते हैं, लोक संग्रहात्मक कर्म ही इनके यज्ञ बन जाते हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (विश्वेषाम्-इरज्यवः) सर्वेषां खल्वीश्वराः स्थ “इरज्यति ऐश्वर्यकर्मा” [निघ० ३।२१] (देवानां महः-वाः) युष्माकं देवानां महद् वरणीयं ज्ञानमस्ति (विश्वे हि विश्वमहसः) सर्वे हि सर्वमहत्त्ववन्तः (यज्ञेषु यज्ञियाः) यज्ञप्रसङ्गेषु सत्करणीयाः स्थ ॥३॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O masters of the world, great is the glory of the divinities. All of them command universal majesty, all of them are adorable in yajnic congregations.