पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार देवों का पूजन करनेवाला भी देव बनता है । सो देवों के लक्षण प्रस्तुत मन्त्र में कहते हैं। ये देव (विश्वेषाम्) = शरीर में साधनरूप से प्राप्त करायी गयी इन्द्रियों के, मन के व बुद्धि के इन शरीर में प्रविष्ट सब साधनों के ये (इरज्यवः) = स्वामी होते हैं, इनके वशीकरण से ही तो सब साध्यों को ये सिद्ध कर पाते हैं । [२] इन साधनों के ठीक प्रयोग करने से ही (देवानाम्) = इन देवों का (महः वाः) = महान् वरणीय धन होता है। ये उचित साधनों से खूब ही ऐश्वर्य को प्राप्त करते हैं । [३] (विश्वे हि) = ये सब देव निश्चय से (विश्वमहसः) = सम्पूर्ण तेजोंवाले होते हैं। [४] (विश्वे) = ये सब (यज्ञेषु यज्ञियाः) = सदा उत्तम यज्ञों में प्रवृत्त रहनेवाले होते हैं । उत्तम कर्मों में सदा व्यापृत रहते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- देवों के लक्षण ये हैं- [क] इन्द्रियों, मन व बुद्धि के ये स्वामी होते हैं [हृषीकेश], [ख] महान् वरणीय धन का अर्जन करते हैं, [ग] तेजस्वी होते हैं, [घ] यज्ञों में लगे रहते हैं, लोक संग्रहात्मक कर्म ही इनके यज्ञ बन जाते हैं ।