वांछित मन्त्र चुनें
417 बार पढ़ा गया

ए॒तं मे॒ स्तोमं॑ त॒ना न सूर्ये॑ द्यु॒तद्या॑मानं वावृधन्त नृ॒णाम् । सं॒वन॑नं॒ नाश्व्यं॒ तष्टे॒वान॑पच्युतम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

etam me stomaṁ tanā na sūrye dyutadyāmānaṁ vāvṛdhanta nṛṇām | saṁvananaṁ nāśvyaṁ taṣṭevānapacyutam ||

पद पाठ

ए॒तम् । मे॒ । स्तोम॑म् । त॒ना । न । सूर्ये॑ । द्यु॒तत्ऽया॑मानम् । व॒वृ॒ध॒न्त॒ । नृ॒णाम् । स॒म्ऽवन॑नम् । न । अस्व्य॑म् । तष्टा॑ऽइव । अन॑पऽच्युतम् ॥ १०.९३.१२

417 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:93» मन्त्र:12 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:28» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:8» मन्त्र:12


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मे) मेरे (एतं स्तोमम्) इस स्तुतिसमूह को विद्वान् जन बढ़ावें, प्रोत्साहित करें-पुष्ट करें (सूर्यो तना न) सूर्य में विस्तृत रश्मियाँ जैसे (द्युतद्यामानम्) दीप्तिमान् मार्गयुक्त ज्योतिर्मण्डल को बढ़ाती हैं (नृणां संवननं न अश्व्यम्) मनुष्यों का सम्भजनीय अश्वयोग्य रथ जैसे (अनपच्युतम्) अपच्युतिरहित (तष्टा-इव) शिल्पी रथकार से रचा होता है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा के प्रति स्तुति करनेवाले स्तुतिसमूह को निन्दित दृष्टि से न देखें, किन्तु उसे प्रोत्साहन दें, बढ़ावें। सूर्य की किरणें जैसे सूर्यमण्डल को बढ़ाती हैं या जैसे रथकार शिल्पी घोड़े के उपयुक्त रथ को चलने योग्य बनाता है, अलंकृत करता है, वैसे विद्वान् जन अपने प्रशंसित वचनों से बढ़ावा दें, अलंकृत करें ॥१२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

दीप्तगमन का साधन 'स्तोम'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (एतम्) = इस (मे) = मेरे से किये जानेवाले (स्तोमम्) = स्तुति समूह को सब देव (वावृधन्त) = बढ़ानेवाले हों। उस प्रकार बढ़ानेवाले हों (न) = जैसे कि (सूर्ये) = सूर्य में (तना) = रश्मिजाल को सूर्य में जैसे रश्मियाँ विस्तृत हो रही हैं इसी प्रकार मेरे जीवन में प्रभु के स्तोत्र विस्तृत हों, मैं निरन्तर प्रभु का स्तवन करनेवाला बनूँ। यह स्तोम द्(युतद्यामानम्) = दीप्तगमनवाला हो, इसके द्वारा मुझे मार्ग भली-भाँति दिखे। मेरे जीवनमार्ग को यह रोशन करनेवाला हो । प्रभु को सर्वज्ञ रूप में स्मरण करता हुआ मैं भी ज्ञान में रुचिवाला बनूँ । प्रभु को दयालु रूप में देखता हुआ मैं भी दया करनेवाला बनूँ। [२] यह स्तोम (नृणां संवननम्) = मनुष्यों का सम्यक् सेवनीय है [वन संभक्तौ] अथवा यह मनुष्यों को विजयी बनानेवाला है [वन् = win] विजय का यह साधन है । यह स्तोम क्या है, यह तो विजय के साधन के समान है । [३] (इव) = जैसे (तष्टा) = बढ़ई (अनपद्युतम्) = अपच्युत न होनेवाले दृढ तथा अश्वम् = अश्वों के लिए उत्तम रथ को बनाता है इसी प्रकार हम स्तोम को बनानेवाले हों। यह हमारा स्तोम भी च्युतिरहित हो, स्तुति विच्छिन्न न हो जाए तथा यह स्तुति हमारे इन्द्रिय रूप अश्वों को उत्तम बनानेवाली हो ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रभु का स्तवन मुझे अन्तः शत्रुओं से संघर्ष में विजयी बनाता है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (मे) मम (एतं स्तोमम्) इमं स्तुतिसमूहं (ववृधन्त) विद्वांसो वर्धयन्तु प्रोत्साहयन्तु-पोषयन्तु (सूर्ये तना न द्युतद्यामानम्) सूर्ये विस्तृता रश्मयो यथा दीप्यमानमार्गयुक्तं ज्योतिर्मण्डलं वर्धयन्ति (नृणां संवननं न-अश्व्यम्) मनुष्याणां सम्भजनीयमश्वार्हं रथं यथा (अनपच्युतम्) अपच्युतिरहितं (तष्टा-इव) शिल्पिना रथकारेणेव रचितं भवति ॥१२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - May the singers of divinity and celebrants of humanity exalt and extend this my song of divine adoration and united human celebration like radiant rays of the sun spreading light or a craftsman launching an infallible automotive fast chariot on boundless ways.