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मू॒र्धा भु॒वो भ॑वति॒ नक्त॑म॒ग्निस्तत॒: सूर्यो॑ जायते प्रा॒तरु॒द्यन् । मा॒यामू॒ तु य॒ज्ञिया॑नामे॒तामपो॒ यत्तूर्णि॒श्चर॑ति प्रजा॒नन् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mūrdhā bhuvo bhavati naktam agnis tataḥ sūryo jāyate prātar udyan | māyām ū tu yajñiyānām etām apo yat tūrṇiś carati prajānan ||

पद पाठ

मू॒र्धा । भु॒वः । भ॒व॒ति॒ । नक्त॑म् । अ॒ग्निः । ततः॑ । सूर्यः॑ । जा॒य॒ते॒ । प्रा॒तः । उ॒त्ऽयन् । मा॒याम् । ऊँ॒ इति॑ । तु । य॒ज्ञिया॑नाम् । ए॒ताम् । अपः॑ । यत् । तूर्णिः॑ । चर॑ति । प्र॒ऽजा॒नन् ॥ १०.८८.६

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:88» मन्त्र:6 | अष्टक:8» अध्याय:4» वर्ग:11» मन्त्र:1 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:6


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नक्तम्) रात्रि में (अग्निः) वैश्वानर अग्नि (भुवः-मूर्धा भवति) सब भूतों का मूर्धा की भाँति ज्ञानदर्शनसूचक होता है। अग्निरूप से (ततः-प्रातः-उद्यन्-सूर्यः-जायते) पुनः वही वैश्वानर अग्नि प्रातःकाल उदय होता हुआ सूर्य नाम से प्रसिद्ध होता है (यज्ञियानाम्) यज्ञसम्पादी दिव्यपदार्थों के मध्य में तो (उ तु-एतां मायाम्) इस प्रज्ञा को ज्ञान-प्रज्ञान की सूचना को मानते हैं, जनसाधारण याज्ञिक (प्रजानन्-तूर्णिः) प्रज्ज्वलित हुआ शीघ्र (अपः-चरति) प्रकाशित कर्म को पूरा करता है ॥६॥
भावार्थभाषाः - वैश्वानर अग्नि दिन-रात सब स्थानों पर कार्य करता है। भिन्न नाम रूपों से रात्रि में अग्नि बनकर, दिन में सूर्य बनकर, वेदि में यज्ञाग्नि होकर याज्ञिकों को ज्ञान का निमित्त बनता है ॥६॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'सब क्रियाओं के प्रवर्तक' प्रभु

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (भुवः मूर्धा) = इस उत्पन्न जगत् का शिरोमणि (अग्निः) = अग्रेणी प्रभु (नक्तम्) = [न अक्तम्=न व्यक्तम्] अव्यक्त है, इन बाह्य इन्द्रियों का वह विषय नहीं बनता । [२] यह (प्रातः उद्यन्) = प्रातः उदय होता हुआ (सूर्य:) = सूर्य (ततः जायते) = उसी से होता है । उस प्रभु की ज्योति से ही सूर्यादि सब पिण्ड ज्योतिर्मय होते हैं 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' । [३] वे प्रभु 'सूर्यादि को ही ज्योति प्राप्त कराते हों' ऐसी बात नहीं, सब बुद्धिमान् व्यक्तियों को बुद्धि के देनेवाले भी वे ही हैं। वह (तूर्णि:) = त्वरा से सब कार्यों को करनेवाले, (प्रजानन्) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले प्रभु ही (यज्ञियानाम्) = प्रभु से संगतिकरण में उत्तम पुरुषों [यज संगतिकरण] की (एताम्) = इस मायाम् प्रज्ञा को (उ तु) = निश्चय से ही (चरति) = करते हैं, अर्थात् अपने सम्पर्क में आनेवाले यज्ञिय पुरुषों को प्रभु ही प्रज्ञा प्राप्त कराते हैं। [४] 'ज्ञानियों को ज्ञान ही प्रभु दे रहे हों' सो बात नहीं, अन्य सब (यत्) = जो (अपः) = कार्य हैं, उनको भी प्रभु ही (चरति) = करते हैं । वैश्वानर अग्नि के रूप में प्राणियों के शरीर में स्थित होकर भोजन का पाचन भी तो वे ही करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-वे अव्यक्त प्रभु संसार के संचालक हैं। वे ही सूर्य को उदित करते हैं, उपासकों को प्रज्ञा प्राप्त कराते हैं, अन्य सब ब्रह्माण्ड में होनेवाली क्रियाओं को वे ही करते हैं।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (नक्तम्) रात्रौ (अग्निः-भुवः-मूर्धा-भवति) वैश्वानरोऽग्निः सर्वेषां भूतानां मूर्धा-मूर्धवज्ज्ञानदर्शनसूचको भवति खल्वग्निरूपेण (ततः प्रातः-उद्यन्-सूर्यः-जायते) स एव वैश्वानरोऽग्निः प्रातः प्रकटीभवन् सूर्यनामतः प्रसिद्धो भवति (यज्ञियानाम्-उ तु-एतां मायाम्) यज्ञसम्पादिनां दिव्यपदार्थानां मध्ये तु खलु इमां प्रज्ञां प्रज्ञानसूचनां मन्यन्ते याज्ञिकाः (प्रजानन् तूर्णिः-अपः-चरति) प्रज्वलयन् प्रकाशयन् कर्म क्षिप्रं चरति-पारयति। निरुक्तानुरूपोऽर्थः ॥६॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni as Vaishvanara is awake and vibrates as the prime reality and spirit of existence at night when the whole world sleeps. Then in the morning, rising with the dawn, it shines as the sun. It is but the wondrous work of the highest of adorables, cosmic Maya, that it thus moves and vibrates at the fastest, knowing and watching all actions and movements of the world of moving and non-moving objects.