'सब क्रियाओं के प्रवर्तक' प्रभु
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (भुवः मूर्धा) = इस उत्पन्न जगत् का शिरोमणि (अग्निः) = अग्रेणी प्रभु (नक्तम्) = [न अक्तम्=न व्यक्तम्] अव्यक्त है, इन बाह्य इन्द्रियों का वह विषय नहीं बनता । [२] यह (प्रातः उद्यन्) = प्रातः उदय होता हुआ (सूर्य:) = सूर्य (ततः जायते) = उसी से होता है । उस प्रभु की ज्योति से ही सूर्यादि सब पिण्ड ज्योतिर्मय होते हैं 'तस्य भासा सर्वमिदं विभाति' । [३] वे प्रभु 'सूर्यादि को ही ज्योति प्राप्त कराते हों' ऐसी बात नहीं, सब बुद्धिमान् व्यक्तियों को बुद्धि के देनेवाले भी वे ही हैं। वह (तूर्णि:) = त्वरा से सब कार्यों को करनेवाले, (प्रजानन्) = प्रकृष्ट ज्ञानवाले प्रभु ही (यज्ञियानाम्) = प्रभु से संगतिकरण में उत्तम पुरुषों [यज संगतिकरण] की (एताम्) = इस मायाम् प्रज्ञा को (उ तु) = निश्चय से ही (चरति) = करते हैं, अर्थात् अपने सम्पर्क में आनेवाले यज्ञिय पुरुषों को प्रभु ही प्रज्ञा प्राप्त कराते हैं। [४] 'ज्ञानियों को ज्ञान ही प्रभु दे रहे हों' सो बात नहीं, अन्य सब (यत्) = जो (अपः) = कार्य हैं, उनको भी प्रभु ही (चरति) = करते हैं । वैश्वानर अग्नि के रूप में प्राणियों के शरीर में स्थित होकर भोजन का पाचन भी तो वे ही करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ-वे अव्यक्त प्रभु संसार के संचालक हैं। वे ही सूर्य को उदित करते हैं, उपासकों को प्रज्ञा प्राप्त कराते हैं, अन्य सब ब्रह्माण्ड में होनेवाली क्रियाओं को वे ही करते हैं।