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स॒म्राज्ञी॒ श्वशु॑रे भव स॒म्राज्ञी॑ श्व॒श्र्वां भ॑व । नना॑न्दरि स॒म्राज्ञी॑ भव स॒म्राज्ञी॒ अधि॑ दे॒वृषु॑ ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

samrājñī śvaśure bhava samrājñī śvaśrvām bhava | nanāndari samrājñī bhava samrājñī adhi devṛṣu ||

पद पाठ

स॒म्ऽराज्ञी॑ । श्वशु॑रे । भ॒व॒ । स॒म्ऽराज्ञी॑ । श्व॒श्र्वाम् । भ॒व॒ । नना॑न्दरि । स॒म्ऽराज्ञी॑ । भ॒व॒ । स॒म्ऽराज्ञी॑ । अधि॑ । दे॒वृषु॑ ॥ १०.८५.४६

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:46 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:28» मन्त्र:6 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:46


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (श्वशुरे) हे वधू ! तू श्वशुर-मेरे पिता के अन्दर अपने व्यवहार से (सम्राज्ञी भव) महाराणी के पद को प्राप्त कर (श्वश्र्वाम्) सास-मेरी माता के अन्दर भी (सम्राज्ञी भव) महाराणी हो (ननान्दरि) ननद-मेरी बहन के अन्दर (सम्राज्ञी भव) महाराणी का पद प्राप्त कर (देवृषु अधि) देवरों-मेरे भ्राताओं में (सम्राज्ञी) महाराणी का पद प्राप्त कर ॥४६॥
भावार्थभाषाः - वधू का परिवार में व्यवहार ऐसा होना चाहिए कि वह श्वशुर, सास, ननद और देवरों के अन्दर सम्मान और स्नेह महाराणी की भाँति प्राप्त कर सके ॥४६॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

सम्राज्ञी

पदार्थान्वयभाषाः - [१] पत्नी को घर में आकर घर का समुचित प्रबन्ध करना है। उससे कहते हैं कि यहाँ तू परायापन अनुभव न करना । परायेपन की बात तो दूर रही तू (श्वशुरे) = श्वशुर में सम्राज्ञी (भव) = सम्राज्ञी बन । उनके सब कार्यों के नियमित रूप से चलने की व्यवस्था कर । [सम्= सम्यक्, राज्=to regrlete]। इसी प्रकार (श्वश्र्वाम्) = श्वश्रू के विषय में (सम्राज्ञी भव) = सम्राज्ञी हो । [२] (ननान्दरि) = ननद के विषय में (सम्राज्ञी भव) = सम्राज्ञी हो और (अधिदेवृषु) = सब देवरों में भी (सम्राज्ञी) = तू सम्राजी हो । यहाँ शासन या हुकूमत की भावना उतनी नहीं है जितना उनके कार्यों की व्यवस्था की उत्तमता से उनके रञ्जन का भाव है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- पत्नी ने घर में सबके कार्यों की समुचित व्यवस्था करके सभी का रञ्जन करना है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (श्वशुरे सम्राज्ञी भव) हे वधु ! त्वं श्वशुरे मम पितरि तदन्तरे स्वव्यवहारेण सम्राज्ञीव सम्यग्राजमाना भव (श्वश्र्वां सम्राज्ञी भव) मम मातरि-मातुरन्तःकरणेऽपि सम्राज्ञीव विराजमाना भव (ननान्दरि सम्राज्ञी भव) मम स्वसरि स्वसुरन्तरे सम्राज्ञीव राजमाना भव (देवृषु-अधि सम्राज्ञी) मम भ्रातृषु खल्वपि सम्राज्ञीव राजमाना भव ॥४६॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Be a darling queen for the father-in-law, be a favourite queen for the mother-in-law, be a loving queen for the sister-in-law, and a kind queen for the brothers- in-law.