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आ॒शस॑नं वि॒शस॑न॒मथो॑ अधिवि॒कर्त॑नम् । सू॒र्याया॑: पश्य रू॒पाणि॒ तानि॑ ब्र॒ह्मा तु शु॑न्धति ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

āśasanaṁ viśasanam atho adhivikartanam | sūryāyāḥ paśya rūpāṇi tāni brahmā tu śundhati ||

पद पाठ

आ॒ऽशस॑नम् । वि॒ऽशस॑नम् । अथो॒ इति॑ । अ॒धि॒ऽवि॒कर्त॑नम् । सू॒र्यायाः॑ । प॒श्य॒ । रू॒पाणि॑ । तानि॑ । ब्र॒ह्मा । तु । शु॒न्ध॒ति॒ ॥ १०.८५.३५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:85» मन्त्र:35 | अष्टक:8» अध्याय:3» वर्ग:26» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:7» मन्त्र:35


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्यायाः) तेजस्वी वधू के (रूपाणि) बाह्यरूपों को (पश्य) जान-समझ (आशसनम्) आशाभाव (विशसनम्) निराश होना (अथ) और (अधिविकर्तनम्) रुष्ट होने पर पीड़ा देना (एतानि) उन बाह्यरूपों को (ब्रह्मा तु) ज्ञानी तो (शुन्धति) शोध देता है-ठीक कर देता है, अन्य व्यभिचारी नहीं ॥३५॥
भावार्थभाषाः - तेजस्वी नव वधू कदाचित् किसी वस्तु की आशा रखती हो या उनके न प्राप्त होने पर उदास हो-निराश हो या रुष्ट होकर हिंसा करने को उद्यत हो-दुःखी करने को उद्यत हो, ज्ञानी पति इनका यथायोग्य शोधन-समाधान करके उसे अनुकूल बना लेता है, अन्य नहीं ॥३५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

'आशसन-विशसन - विकर्तन'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] [क] (आशसनम्) = घर में चारों ओर शासन, अर्थात् घर के सब व्यक्तियों से कार्यों को ठीक ढंग से कराना, [ख] (विशसनम्) = विशिष्ट इच्छाओंवाला होना, अर्थात् घर में उत्कृष्ट इच्छाओं से घर को उन्नत करने का ध्यान करना (अथो) = और [ग] (अधिविकर्तनम्) = कपड़ों को विविधरूपों में काटने आदि का काम करना, (सूर्यायाः) = सूर्या के (रूपाणि) = इन रूपों को (पश्य) = देखिये । अर्थात् गतमन्त्र के अनुसार जैसे सूर्या भोजन की व्यवस्था को अपने अधीन रखती है, उसी प्रकार प्रस्तुत मन्त्र के अनुसार सूर्या घर का समुचित शासन करती है, उत्कृष्ट इच्छाओंवाली होती हुई घर को उन्नत करती है तथा कपड़ों के सीने आदि के काम को भी स्वयं करती है । [२] (ब्रह्मा) = घर के निर्माण करनेवाला समझदार पति तु तो तानि सूर्या के उन कार्यों को (शुन्धति) = शुद्ध करने का प्रयत्न करता है। अर्थात् उनमें जो थोड़ी बहुत कमी हो उसे उचित परामर्श देकर ठीक करने के लिये यत्नशील होता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - गृहपत्नी [क] घर का शासन करती है, [ख] नये-नये initiatives को लेकर घर को उन्नत करती है, [ग] वस्त्रों के काटने सीने आदि के काम को स्वयं करती है।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सूर्यायाः-रूपाणि पश्य) तेजस्विन्या नववध्वाः-बाह्यरूपाणि जानीहि (आशसनं विशसनम्-अथ-अधिविकर्तनम्) आशाभावः, निराशाभावः-औदासीन्यम्, रुष्टभावेन पीडनं च (तानि ब्रह्मा तु शुन्धति) यो ब्रह्मज्ञानी विधिना पतिः स तानि शोधयति, नान्यो व्यभिचारी ॥३५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Hope, fear and debasement, frustration, anger and cruelty, and the irony that cuts too deep to the very core, these are various moods and manners of women.$These the wise vision knows and corrects, purifies or excuses with superior understanding.