पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अदितेः) = अविनाशी प्रकृति के (अष्टौ पुत्रासः) = आठ पुत्र हैं, (ये) = जो (तन्वः) = उस प्रकृति के शरीर से (परिजाता:) = चारों ओर उत्पन्न हुए । अदिति के ये आठ पुत्र 'मित्र, वरुण, धाता, अर्यमा, अंश, भग और विवस्वान्' इन सात पुत्रों द्वारा यह देवान् देवों को (उप प्रैत्) = समीपता से प्राप्त होती है और आठवें (मार्ताण्डम्) = इस आदित्य को (परा) = देवलोकों से दूर इस मर्त्यलोक के समीप (आस्यत्) = फेंकती है, स्थापित करती है । [३] सम्भवतः यह ब्रह्माण्ड ८ सौर लोकों से बना है। इन आठ में मित्र, वरुण आदि सूर्यों को केन्द्र बनाकर विद्यमान लोक 'देवलोक' कहलाते हैं और आदित्य को केन्द्र में स्थापित करके चलनेवाला यह लोक मर्त्यलोक है। सबसे प्रथम देवलोक 'मित्रलोक' है, दूसरा 'वरुणलोक', तीसरा 'धातृ लोक', चौथा अर्यम-लोक, पाँचवाँ ' अंशलोक', छठा 'भग लोक', सातवाँ 'विवस्वत् लोक' है। इन देवलोकों की समाप्ति पर आठवाँ यह मर्त्यलोक से जिसका सूर्य 'आदित्य' है अथवा जिसे मार्त्ताण्ड भी कहते हैं क्योंकि इसकी गति दिन-रात को बनाती हुई प्राणियों की मृत्यु का कारण बनती है । [४] जो व्यक्ति गुणों की आदान की वृत्तिवाला बनता है और आदित्य की तरह खारे पानी में से भी शुद्ध जल को ही लेनेवाले सूर्य की तरह अच्छाइयों को ही ग्रहण करता है वह आदित्य लोक का विजय करके विवस्वान् के लोक में जन्म लेता है, यहां यह 'विवासयति' ज्ञान-किरणों से अन्धकार को दूर करनेवाला होता है। इस प्रकार से स्वाध्याय से ज्ञान प्रकाश को बढ़ाता हुआ यह इस विवस्वान् के लोक को जीतकर 'भग लोक' में जन्म लेता है। वहाँ प्रभु का भजन उपासन करनेवाला बनकर 'अंशलोक' में पहुँचता है और यहाँ अपनी सम्पत्तियों का अंशापन करता हुआ, सारे का सारा स्वयं न खाकर सदा बाँटता हुआ 'अर्यमा लोकं' में पहुँचता है। यहां 'अरीन् यच्छति' काम-क्रोध-लोभ आदि शत्रुओं का नियमन करता हुआ 'धातृलोक' में जन्म लेता है। यहाँ सबके धारण की वृत्तिवाला बनकर 'वरुण लोक ' में पहुँचता है। यहाँ द्वेष - ईर्ष्या आदि का पूर्णतया निवारण करनेवाला बनकर 'मित्र लोक' में आता है । यह अन्तिम लोक है, यहाँ सबके साथ स्नेह से चलता हुआ यह ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है और जन्म-मरण के चक्र से ऊपर उठ जाता है, प्रकृति से ऊपर उठकर परमेश्वर को पा लेता है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रकृति से आठ लोक बने हैं। सात देवलोक हैं, आठवाँ यह मर्त्यलोक । हमें इनका उत्तरोत्तर विजय करते हुए ब्रह्मलोक में पहुँचना है ।
अन्य संदर्भ: सूचना-सात देववृत्तियाँ हैं— [क] (विवस्वान्) = स्वाध्याय द्वारा अज्ञानान्धकार को दूर करना,[ख] (भग) = प्रभु-भजन करते हुए मन को शुद्ध बनाना, भजनीय ऐश्वर्य को ही कमाना, [ग] (अंश) = अर्जित ऐश्वर्य को विभक्त करके खाने की वृत्तिवाला होना, [घ] (अर्यमा) = लोभादि शत्रुओं को जीतना, [ङ] (धाता) = सबका धारण करनेवाला बना, [च] (वरुण) = किसी से द्वेष न करना और [छ] (मित्र) = सबके साथ स्नेह से चलना । इन दिव्यगुणों को अपनानेवाला ही प्रभु को प्राप्त करता है ।