वांछित मन्त्र चुनें
435 बार पढ़ा गया

यथे॒यं पृ॑थि॒वी म॒ही दा॒धारे॒मान्वन॒स्पती॑न् । ए॒वा दा॑धार ते॒ मनो॑ जी॒वात॑वे॒ न मृ॒त्यवेऽथो॑ अरि॒ष्टता॑तये ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

yatheyam pṛthivī mahī dādhāremān vanaspatīn | evā dādhāra te mano jīvātave na mṛtyave tho ariṣṭatātaye ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

यथा॑ । इ॒यम् । पृ॒थि॒वी । म॒ही । दा॒धार॑ । इ॒मान् । वन॒स्पती॑न् । ए॒व । दा॒धा॒र॒ । ते॒ । मनः॑ । जी॒वात॑वे । न । मृ॒त्यवे॑ । अथो॒ इति॑ । अ॒रि॒ष्टऽता॑तये ॥ १०.६०.९

435 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:60» मन्त्र:9 | अष्टक:8» अध्याय:1» वर्ग:25» मन्त्र:3 | मण्डल:10» अनुवाक:4» मन्त्र:9


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा-इयं मही पृथिवी-इमान् वनस्पतीन् दाधार) जैसे यह महती पृथिवी इन वृक्षादि वनस्पतियों को धारण करती है (एवा दाधार ते……) आगे पूर्ववत् ॥९॥
भावार्थभाषाः - यह महत्त्वपूर्ण-महती पृथिवी ओषधि वनस्पतियों को जैसे संभालती है, ऐसे ही चिकित्सक को भी रोगी के मन को शरीर में दृढ़रूप से धैर्य देकर स्थिर करना चाहिए तथा ओषधियों से उसके मन को शान्त करना चाहिए। उसके जीवित रहने का यत्न करना चाहिए ॥९॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मन को यज्ञों में बाँधना

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यथा) = जैसे (इयं मही पृथिवी) = यह महनीय पृथ्वी (इमान् वनस्पतीन्) = इन वनस्पतियों को दाधार धारण करती है। पृथ्वी में गड़े हुए [दृढमूल] ये वनस्पति इधर-उधर भटकते नहीं। (एवा) = इसी प्रकार (ते मनः) = तेरे मन को भी (दाधार) = प्रभु में व यज्ञ में (दाधार) = धारण करते हैं । जिससे (जीवातवे) = तेरा जीवन सुन्दर बना रहे, (न मृत्यवे) = तू मृत्यु की ओर न चला जाए। (अथ उ) - और अब निश्चय से (अरिष्टतातये) = अहिंसन व शुभ का विस्तार हो सके। [२] हमारा मन यज्ञादि उत्तम कर्मों में इस प्रकार स्थिर बना रहे जैसे कि वृक्ष पृथ्वी में स्थिरता से बद्धमूल होते हैं। इसी में जीवन है, इसी में मृत्यु से बचाव है, यही शुभ के विस्तार का साधन है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम मन को स्थिर करके दीर्घजीवी व शुभ जीवनवाले हों ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यथा इयं मही पृथिवी इमान् वनस्पतीन् दाधार) यथा हीयं महती पृथिवी वनस्पतीन् वृक्षादीन् धारयति (एवा दाधार ते……) अग्रे पूर्ववत् ॥९॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O man, just as this great earth holds and bears these herbs and trees (for the sustenance of life), so does the soul hold and bear your mind and spirit, not for death but for your life, fulfilment and freedom from evil and misfortune.