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यस्य॑ मा ह॒रितो॒ रथे॑ ति॒स्रो वह॑न्ति साधु॒या । स्तवै॑ स॒हस्र॑दक्षिणे ॥
अंग्रेज़ी लिप्यंतरण
मन्त्र उच्चारण
yasya mā harito rathe tisro vahanti sādhuyā | stavai sahasradakṣiṇe ||
पद पाठ
यस्य॑ । मा॒ । ह॒रितः॑ । रथे॑ । ति॒स्रः । वह॑न्ति । सा॒धु॒ऽया । स्तवै॑ । स॒हस्र॑ऽदक्षिणे ॥ १०.३३.५
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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:33» मन्त्र:5
| अष्टक:7» अध्याय:8» वर्ग:1» मन्त्र:5
| मण्डल:10» अनुवाक:3» मन्त्र:5
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) जिस परमात्मा के (सहस्रदक्षिणे रथे) बहुत लाभवाले रमणीय मोक्ष पद में (मा तिस्रः-हरितः) मुझे तीन स्तुति-प्रार्थनोपासनाएँ सुख पहुँचानेवाली (साधुया वहन्ति) सुगमता से पहुँचाती हैं (स्तवै) उस परमात्मा की मैं प्रशंसा करता हूँ ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा की स्तुति-उपासना द्वारा मनुष्य मोक्ष का भागी बनता है ॥५॥
हरिशरण सिद्धान्तालंकार
दमन व दान
पदार्थान्वयभाषाः - [१] प्रभु कहते हैं कि रथे इस शरीररूप रथ में यस्य - जिसके तिस्रः हरितः - तीनों दुःखहरण के साधनभूत घोड़े, 'इन्द्रियाँ, मन व बुद्धि' मा मुझे साधुया - बड़ी उत्तमता से वहन्ति वहन करनेवाले होते हैं उस सहस्रदक्षिणे- शतशः दानों को देनेवाले के लिये स्तवै मैं प्रशंसा करता हूँ। [२] जैसे एक उत्तम सन्तान पिता से प्रशंसात्मक शब्दों को सुनता है इसी प्रकार वह जीव भी प्रभु से प्रशंसनीय होता है जो कि अपनी- [क] इन्द्रियों, मन व बुद्धि को अपने वश में करके प्रभु-प्रवण करता है। इनके द्वारा प्रभु-दर्शन के लिये यत्नशील होता है तथा [ख] भोग-प्रवण वृत्ति के न होने के कारण सदा दान देनेवाला बनता है। दान देने में एक आनन्द का अनुभव करता है। [३] इस प्रकार ये 'दम' व 'दान' उसको प्रभु की प्राप्ति करानेवाले होते हैं। इन्द्रियों, मन व बुद्धि को विषयों से रोकना 'दमन' है, सहस्र-दक्षिण बनना 'दान' है।
भावार्थभाषाः - भावार्थ – प्रभु का प्रिय वही है जो दम व दान को अपनाता है। ये ही उसे प्रभु क तक पहुँचानेवाले होते हैं।
ब्रह्ममुनि
पदार्थान्वयभाषाः - (यस्य) यस्य परमात्मनः (सहस्रदक्षिणे) बहुफललाभकरे-ऽध्यात्मपदे (रथे) रमणीयमोक्षे (मा तिस्रः-हरितः साधुया वहन्ति) मां तिस्रः स्तुतिप्रार्थनोपासनाः-हरणशीलाऽऽहरणाः साधु प्रापयन्ति “साधुया” “सुपां सुलुक्०” याच् प्रत्ययः (स्तवै) तं प्रशंसामि ॥५॥
डॉ. तुलसी राम
पदार्थान्वयभाषाः - I celebrate and adore Indra, generous lord of thousandfold charity of kindness and grace, whose threefold gifts of divine knowledge, holy will and grateful prayer and adoration transport me like three horses of the divine chariot of human life well through and across the world of human existence to the state of freedom from limitations and eternal bliss.
