पदार्थान्वयभाषाः - [१] हे (कलश) = [कलाः शेरते अस्मिन्] 'प्राण, श्रद्धा, आकाश, वायु, ज्योति, जल, पृथिवी, इन्द्रिय, मन, अन्न, वीर्य, तप, मन्त्र, कर्म, लोक व नाम' रूप १६ कलाओं के आधारभूत ! (कुरुश्रवण) = उस पिता प्रभु की वाणी को सुननेवाले व करनेवाले ! प्रभु की वाणी को सुनते ही तदनुसार कार्य करनेवाले जीव ! (मघानि ददतः) = ऐश्वर्यों के देनेवाले तेरे एतानि भद्रा इन कल्याणों को (क्रियाम) = हमने किया है। गत मन्त्र में वर्णित प्रकार से तेरे जीवन को उत्तम बनाया है । [२] हे (मघवान:) = ऐश्वर्य सम्पन्न पुरुषो! (वः) = तुम्हारा (अयम्) = यह दान देना (इत्) = सचमुच (दान:) = दान ही अस्तु हो 'दाय् लवने' यह तुम्हारी बुराइयों का लवन करनेवाला हो, उनको नष्ट करनेवाला हो और इस प्रकार बुराइयों को नष्ट करके 'दैप् शोधने' यह तुम्हारे जीवन का शोधन करनेवाला हो । (अयं च सोमः) = और यह (सोम) = वीर्यशक्ति भी तुम्हारे जीवन में रोगादि को दूर करके शोधन करनेवाली हो, (यम्) = जिस सोमशक्ति को (हृदि) = तुम्हारे हृदय में (बिभर्मि) = मैं धारण करता हूँ । तुम्हारे हृदय में सम्पूर्ण आहार-विहारों को करते समय यह भावना हो कि मेरे ये आहार- विहार सोम का रक्षण करनेवाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम प्रभु की वाणी को सुनें और तदनुसार क्रिया को करें। दान देनेवाले हों, इसी में हमारा कल्याण है। यह दान हमारी बुराइयों को नष्ट करके जीवन का शोधन करे। हमारे हृदय में सोम के रक्षण की भावना हो । हम उत्तम से उत्तम मार्ग की ओर चलें। [१] दिव्य प्रकाश को प्राप्त करें, [२] 'भद्र पुरुष' बनें, [३] हमारे पर इन्द्रियों का शासन न हो, [४] दुरित का विरेचन हो, [५] विद्वानों से अनुशिष्ट होकर हम भद्र मार्ग पर चलें, [६] ज्ञानी से ही मार्ग का ज्ञान प्राप्त होता है, [७] मार्ग पर चलने से ही सुन्दर जीवन का प्रारम्भ होता है, [८] हमें चाहिए कि प्रभु की वाणी को सुनें और करें। प्रभु कह रहे हैं 'दान दो और सोम का रक्षण करनेवाले बनो, तभी देव हमारा रक्षण करेंगे'।