पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के अनुसार सात्त्विक अन्नों का प्रयोग करनेवाले (एते) = ये व्यक्ति (शमीभिः) = शान्तभाव से किये जानेवाले कर्मों से (सुशमी:) = उत्तम कर्मों वाले (अभूवन्) = होते हैं । वे व्यक्ति, (ये) = जो (उक्थैः) = प्रभु के स्तोत्रों के द्वारा (सोम) = सोम के सुरक्षित होने पर (तन्व:) = शरीरों को (हिन्विरे) = बढ़ाते हैं । प्रभुस्तवन से हमारा जीवन वासनामय नहीं होता और वासनाओं के अभाव में सोम का रक्षण होता है । यह सुरक्षित (सोम) = वीर्य शरीर के वर्धन का कारण बनता है । [२] हे प्रभो ! (नृवत्) = एक नेता की तरह (वदन्) = उपदेश देते हुए आप (नः) = हमारे (वाजान्) = बलों को (उपमाहि) = समीपता से बनानेवाले होइये। एक नेता जैसे अपने अनुयायियों को ठीक मार्ग का उपदेश देता है, उसी प्रकार प्रभु हमें ठीक मार्ग का उपदेश देते हुए हमें कहते हैं कि तू (दिवि) = [मूर्ध्नो धीः] अपने मस्तिष्क रूप द्युलोक में (श्रवः) = ज्ञान को (दधिषे) = धारण करता है और (वीरः नाम) = वीर नामवाला होता है, अर्थात् तेरा आदर्श यही होना चाहिए कि 'मस्तिष्क में ज्ञान और भुजाओं में वीरता' । 'ज्ञानी वीर' ही आदर्श मनुष्य है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - सात्त्विक अन्नों के सेवन से हम शान्तभाव से कर्मों को करनेवाले हों । प्रभु स्तवन से शरीर में सोम को सुरक्षित करें। हम प्रभु के उपदेश के अनुसार चलते हुए ज्ञानी वीर बनें। सूक्त का प्रारम्भ इस प्रकार हुआ है कि चित्तवृत्ति के निरोध के अभ्यास से हम प्रभुदर्शन करें। [१] प्रभु उसीका रक्षण करते हैं, जो सोम का रक्षण करता है, [२] सोमरक्षण से शक्तिशाली बनकर, विघ्नों को दूर करते हुए हम आगे बढ़ें, [३] प्रभु कृपा हमें मृग से मृगपति बना देती है, [४] हम प्रभु के ही तो पुत्र हैं, [५] प्रभुदत्त ज्ञान से वासनाओं को नष्ट करके हम 'अशत्रु' बन जाते हैं, [६] तवस उग्र व वृषा बनते हैं, [७] असंगरूप परशु से हम वासनावन को काटने वाले होते हैं, [८] इससे हम शश से शेर बन जाते हैं, [९] प्रभु कृपा से हम सदा मध्यमार्ग से चलते हैं, [१०] सात्त्विक अन्नों का सेवन करते हैं और [११] 'ज्ञानी वीर' बनते हैं, [१२] सात्त्विक अन्नों के सेवन करनेवाले का जीवन उन्नत होता है ।