पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मर्यतः) = प्रकृति के पीछे मरनेवाले, उसकी प्राप्ति के लिये अत्यन्त लालायित, (वधूयोः) = प्रकृति को अपनी वधू बनाने की कामनावाले के वार्येण (पन्यसा) = वरणीय सुन्दर स्तोत्र से यह प्रकृति (कियती परिप्रीता) = कितनी प्रसन्न हो सकती है ? अर्थात् यदि हम इन प्राकृतिक भोगों के पीछे दौड़ते हैं तो ये प्राकृतिक भोग हमारा देर तक कल्याण नहीं कर सकते। प्रकृति के पीछे मरनेवाले को यह प्रकृति देर तक प्रसन्न नहीं कर सकती। [२] यह तो तभी (भद्रा) = कल्याणकर तथा (वधूः) = [ वहति कार्यधुरं] व हमारे कार्यों का वहन करनेवाली (भवति) = होती है (यत्) = जब कि (सुपेशा:) = सुन्दर आकृति को जन्म देनेवाली सा वह प्रकृति (जने चित्) = लोगों में निश्चय से (स्वयम्) = अपने आप (मित्रं वनुते) = मित्र को सम्भक्त करती है, प्राप्त होती है। हम प्रकृति के पीछे न मरें, प्रकृति वरण के लिये लालायित न हों, प्रकृति ही हमारा वरण करे। जब प्रकृति हमारा वरण करती है तो यह हमारे कल्याण के लिये होती है और हमारे कार्यों की पूर्ति के लिये होती है, हमारे जीवनों को यह सुन्दर आकार देती है [भद्रा-वधू- सुपेशा: ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रकृति को हम अपना मित्र बनायें, इसे वधू बनाने के लिये लालायित न हों। यह देर तक हमें सन्तुष्ट न कर सकेगी।