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किय॑ती॒ योषा॑ मर्य॒तो व॑धू॒योः परि॑प्रीता॒ पन्य॑सा॒ वार्ये॑ण । भ॒द्रा व॒धूर्भ॑वति॒ यत्सु॒पेशा॑: स्व॒यं सा मि॒त्रं व॑नुते॒ जने॑ चित् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

kiyatī yoṣā maryato vadhūyoḥ pariprītā panyasā vāryeṇa | bhadrā vadhūr bhavati yat supeśāḥ svayaṁ sā mitraṁ vanute jane cit ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

किय॑ती । योषा॑ । म॒र्य॒तः । व॒धू॒ऽयोः । परि॑ऽप्रीता । पन्य॑सा । वार्ये॑ण । भ॒द्रा । व॒धूः । भ॒व॒ति॒ । यत् । सु॒ऽपेशाः॑ । स्व॒यम् । सा । मि॒त्रम् । व॒नु॒ते॒ जने॑ चित् ॥ १०.२७.१२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:27» मन्त्र:12 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:17» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:12


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कियती योषा) कोई स्त्री विवाहयोग्य होती है, जो (वधूयोः-मर्यतः) वधू चाहनेवाले वर की (पन्यसा वार्येण परिप्रीता) गुणप्रशंसा वरने योग्य धन आदि से संतुष्ट हो जाती है (भद्रा वधूः-भवति) कल्याण को प्राप्त होनेवाली वह वधू होती है (यत् सुपेशाः स्वयं सा मित्रं जने चित् वनुते) कि जो सुन्दररूप आभूषणयुक्त जनसमुदाय में स्वयं वर को वरती है ॥१२॥
भावार्थभाषाः - वह वधू भाग्यशालिनी है, जो वधू को चाहनेवाले वर की प्रशंसाभाजन अन्य वस्तुओं द्वारा सन्तुष्ट रहती है और सुभूषित हुई जनसमुदाय में वर को वरती है ॥१२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मित्र न कि योषा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (मर्यतः) = प्रकृति के पीछे मरनेवाले, उसकी प्राप्ति के लिये अत्यन्त लालायित, (वधूयोः) = प्रकृति को अपनी वधू बनाने की कामनावाले के वार्येण (पन्यसा) = वरणीय सुन्दर स्तोत्र से यह प्रकृति (कियती परिप्रीता) = कितनी प्रसन्न हो सकती है ? अर्थात् यदि हम इन प्राकृतिक भोगों के पीछे दौड़ते हैं तो ये प्राकृतिक भोग हमारा देर तक कल्याण नहीं कर सकते। प्रकृति के पीछे मरनेवाले को यह प्रकृति देर तक प्रसन्न नहीं कर सकती। [२] यह तो तभी (भद्रा) = कल्याणकर तथा (वधूः) = [ वहति कार्यधुरं] व हमारे कार्यों का वहन करनेवाली (भवति) = होती है (यत्) = जब कि (सुपेशा:) = सुन्दर आकृति को जन्म देनेवाली सा वह प्रकृति (जने चित्) = लोगों में निश्चय से (स्वयम्) = अपने आप (मित्रं वनुते) = मित्र को सम्भक्त करती है, प्राप्त होती है। हम प्रकृति के पीछे न मरें, प्रकृति वरण के लिये लालायित न हों, प्रकृति ही हमारा वरण करे। जब प्रकृति हमारा वरण करती है तो यह हमारे कल्याण के लिये होती है और हमारे कार्यों की पूर्ति के लिये होती है, हमारे जीवनों को यह सुन्दर आकार देती है [भद्रा-वधू- सुपेशा: ] ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - प्रकृति को हम अपना मित्र बनायें, इसे वधू बनाने के लिये लालायित न हों। यह देर तक हमें सन्तुष्ट न कर सकेगी।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (कियती योषा) काचित् स्त्री भवति यत् (वधूयोः-मर्यतः) वध्वाः काङ्क्षिणो जनस्य (पन्यसा वार्येण परिप्रीता) गुणप्रशंसया वरणीयेन धनादिना परिसन्तुष्टा स्यात् (भद्रा वधूः भवति) कल्याणी वधूस्तु सा भवति (यत् सुपेशाः स्वयं सा मित्रं जने चित्-वनुते) यतः सुरूपा स्वयं पतिं वृणुते जनसमुदाये हि ॥१२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Some maiden feels pleased and satisfied with the dear lovable wealth and speech of the man wooing her for a wife or she is herself pleasing and accepted for her speech and riches. But in reality, that wife is good and fortunate who, noble in person and manners, loves and chooses her friend and husband by herself from amongst the youth.