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अ॒ग्निर्जा॒तो अथ॑र्वणा वि॒दद्विश्वा॑नि॒ काव्या॑ । भुव॑द्दू॒तो वि॒वस्व॑तो॒ वि वो॒ मदे॑ प्रि॒यो य॒मस्य॒ काम्यो॒ विव॑क्षसे ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

agnir jāto atharvaṇā vidad viśvāni kāvyā | bhuvad dūto vivasvato vi vo made priyo yamasya kāmyo vivakṣase ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒ग्निः । जा॒तः । अथ॑र्वणा । वि॒दत् । विश्वा॑नि । काव्या॑ । भुव॑त् । दू॒तः । वि॒वस्व॑तः । वि । वः॒ । मदे॑ । प्रि॒यः । य॒मस्य॑ । काम्यः॑ । विव॑क्षसे ॥ १०.२१.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:21» मन्त्र:5 | अष्टक:7» अध्याय:7» वर्ग:4» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अथर्वणा) स्थिर चित्तवाले योगी के द्वारा (अग्निः-जातः) अग्रणायक परमात्मा अपने आत्मा में साक्षात् किया हुआ (विश्वानि काव्या विदत्) समस्त वेदज्ञानों को जनाता है (विवस्वतः-दूतः-अभवत्) अपने अन्दर विशिष्टरूप से बसानेवाले उपासक का प्रेरक होता है (यमस्य प्रियः काम्यः) संयमी जन का प्रियकारी कमनीय होता है (वः-मदे वि) तुझे हर्ष के निमित्त हम वरते हैं (विवक्षसे) तू विशिष्ट महत्त्ववान् है ॥५॥
भावार्थभाषाः - स्थिरचित्तवाला योगी परमात्मा को अपने आत्मा में साक्षात् करता है। साक्षात् हुआ परमात्मा उपासक के अन्दर वेदज्ञान को समझने की योग्यता प्रदान करता है। उस संयमी उपासक का परमात्मा प्यारा बनता है। उसे अपने हर्ष, आनन्द के लिए अपनाना चाहिए ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

विवस्वान् का दूत

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में प्रार्थना की गई थी कि हम अग्नि बन सकें। उसीका उपाय बतलाते हुए कहते हैं कि (अथर्वणा) = [न थर्वति] डाँवाडोल न होने से तथा [अथ अर्वाङ्] सदा अपने अन्दर आत्मनिरीक्षण करने से (अग्निः) = अग्नि (जात:) = हो जाता है। अग्नि व अग्रेणी बनने के लिये आवश्यक है कि मनुष्य अभ्यास व वैराग्य के द्वारा मन को स्थिर करे । चित्तवृत्तिनिरोध के बिना 'अग्नि' बनने का प्रश्न ही नहीं पैदा होता। इस अग्नि बनने के लिये प्रतिदिन आत्मनिरीक्षण भी नितान्त आवश्यक है । आत्मनिरीक्षण का अभ्यासी पुरुष ही कमियों को दूर करता हुआ आगे बढ़ पाता है। [२] यह अग्नि बननेवाला व्यक्ति (विश्वानि काव्या) = सम्पूर्ण ज्ञानों को (विदद्) = जाननेवाला होता है । वस्तुतः अन्तःस्थित उस महान् अग्नि [प्रभु] के प्रकाश को देखने से यह सम्पूर्ण तत्त्वों के रहस्य को जानने में समर्थ होता है। इसे उस कवि के काव्य प्राप्त होते ही हैं। [३] इन काव्यों को प्राप्त करके यह (विवस्वतः) = ज्ञान की किरणों वाले उस प्रभु का (दूतः भुवत्) = दूत होता है। उसके सन्देश को सर्वत्र फैलानेवाला बनता है। यही जीवन की अन्तिम मंजिल में 'प्राजापत्य यज्ञ में आहुति देना है । [४] इस ज्ञान - सन्देश को फैलाने के कार्य में लगा हुआ यह व्यक्ति (यमस्य) = उस सर्वनियन्ता प्रभु का (प्रियः) = प्यारा होता है। यह सारी प्रजा का भी (काम्यः) = चाहने योग्य होता है। [५] इस की कामना यही होती है कि हे प्रभो ! (वः) = आपकी प्राप्ति के (विमदे) = उत्कृष्ट आनन्द में (विवक्षसे) = सब प्रजायें विशिष्ट उन्नति के लिये हों । सारी प्रजाओं का झुकाव आपकी ओर हो और वे उन्नतिपथ पर आगे बढ़नेवाली हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम स्थिरचित्तता व आत्मनिरीक्षण के द्वारा अग्नि बनें। प्रभु के सन्देशवाहक बनकर प्रभु के प्रिय हों। हमारी कामना यही हो कि सब प्रभु प्रवण होकर उन्नतिपथ पर आगे बढ़ें।
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अथर्वणा) स्थिरचित्तवता योगिना (अग्निः-जातः) अग्रणायकः परमात्मा सम्पादितः स्वात्मनि साक्षात्कृतः (विश्वानि काव्या विदत्) समस्तानि वेदज्ञानानि “त्रयी वै विद्या काव्यं छन्दः” [श०८।५।२।४] वेदयत्-अवेदयत्-अज्ञापयत्‘अडभावश्छान्दसः’ अन्तर्गतो णिजर्थश्च। (विवस्वतः-दूतः-अभवत्) स्वस्मिन् विशिष्टतया वासं कुर्वतः-उपासकस्य प्रेरको भवति (यमस्य प्रियः काम्यः) संयमिनो जनस्य प्रियकारी कमनीयो भवतीति शेषः (वः-मदे वि) त्वां हर्षनिमित्ताय वृणुयाम (विवक्षसे) विशिष्टमहत्त्ववान् त्वमसि ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Agni, light of divinity, realised by the man of constant mind, would enable him to know all knowledge of the world, being the messenger of the spirit of omniscience and love of the man of divine discipline. Agni you are great in your own light and joy for your devotees.