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मृ॒त्योः प॒दं यो॒पय॑न्तो॒ यदैत॒ द्राघी॑य॒ आयु॑: प्रत॒रं दधा॑नाः । आ॒प्याय॑मानाः प्र॒जया॒ धने॑न शु॒द्धाः पू॒ता भ॑वत यज्ञियासः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

mṛtyoḥ padaṁ yopayanto yad aita drāghīya āyuḥ prataraṁ dadhānāḥ | āpyāyamānāḥ prajayā dhanena śuddhāḥ pūtā bhavata yajñiyāsaḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

मृ॒त्योः । प॒दम् । यो॒पय॑न्तः । यत् । ऐत॑ । द्राघी॑यः । आयुः॑ । प्र॒ऽत॒रम् । दधा॑नाः । आ॒प्याय॑मानाः । प्र॒ऽजया॑ । धने॑न । शु॒द्धाः । पू॒ताः । भ॒व॒त॒ । य॒ज्ञि॒या॒सः॒ ॥ १०.१८.२

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:18» मन्त्र:2 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:26» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:2» मन्त्र:2


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञियासः) अध्यात्मयज्ञ करनेवाले मुमुक्षु देवयानमार्गी (मृत्योः पदं योपयन्तः) मृत्यु के कारण अज्ञान विषयसेवन को विलुप्त करते हुए-त्यागते हुए (यत्) जिससे (द्राघीयः प्रतरम्-आयुः-दधानाः-ऐत) अति दीर्घकाल तक प्रकृष्टतर स्वास्थ्यपूर्ण जीवन को धारण करते हुए संसार में यात्रा करो (प्रजया धनेन-आप्यायमानाः) पुत्रादि सन्तान से और मोक्ष ऐश्वर्य के साथ बढ़ते हुए (शुद्धाः पूताः-भवत) दोषरहित पवित्र अन्तःकरणवाले होओ ॥२॥
भावार्थभाषाः - अध्यात्मयज्ञ करनेवाले मुमुक्षुजन मृत्यु के कारणरूप अज्ञान और विषयसेवन को त्यागते हैं और स्वास्थ्यपूर्ण लम्बी आयु को प्राप्त करते हैं। सन्तान तथा ऐश्वर्य से भरपूर होते हुए शुद्ध और पवित्र अन्तःकरणवाले बन जाया करते हैं ॥२॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

मृत्यु-पद-योपन [शुद्ध-पूत - यज्ञिय ]

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में वर्णित (मृत्योः पदम्) = मृत्यु के 'स्वार्थ व भोगमय' मार्ग को (योपयन्तः) = परे धकेलते हुए व अपने से दूर करते हुए (यदा एत) = जब चलते हैं तो (द्राघीयः) = अत्यन्त दीर्घ व (प्रतरं) = उत्कृष्ट (आयु:) = जीवन को (दधानाः) = धारण करते हुए होते हैं । दीर्घ व उत्कृष्ट जीवन को प्राप्त करने का मार्ग यही है कि हम देवयान से चलें, 'दान व ज्ञान' के मार्ग को अपनाएँ। [२] उत्कृष्ट जीवन का ही चित्रण करते हुए कहते हैं कि (प्रजया) = उत्तम सन्तान से तथा (धनेन) = धन से (आप्यायमानाः) = सब दिशाओं में उन्नति करते हुए (शुद्धा:) = शुद्ध अन्तःकरण वाले (पूताः) = यज्ञ व रोगों से शून्य शरीर वाले और (यज्ञियासः) = उत्तम कर्मों में प्रवृत्त (भवतः) = हो जाइये। सांसारिक जीवन में प्रजा व धन का स्थान स्पष्ट है धन के बिना संसार में एक कदम भी उठाना कठिन है । निर्धनता तो महान् पाप है । सन्तान भी प्रतिकूल होकर हमें समाज में अप्रतिष्ठा कराती है तो यह मरणान्तक कष्ट है। |
भावार्थभाषाः - भावार्थ- संसार में रहते हुए हम श्रेष्ठ सन्तान व शुद्ध पवित्र धन प्राप्त कर मृत्यु को दूर भगाते रहें ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (यज्ञियासः) अध्यात्मयज्ञकर्त्तारो मुमुक्षवो देवयानमार्गिणः “यज्ञियानां यज्ञसम्पादिनाम्” [निरु०७।२७] (मृत्योः पदं योपयन्तः) मृत्योः पदं कारणमज्ञानविषयसेवनं विलोपयन्तस्त्यजन्तः (यत्) यतः (द्राघीयः प्रतरम्-आयुः-दधानाः-ऐत) अतिदीर्घकालान्तं प्रकृष्टतरं स्वास्थ्यपूर्णमायुर्जीवनं धारयन्तः, संसारे यात्रां कुरुत (प्रजया धनेन-आप्यायमानाः) पुत्रादिसन्तत्या भोगैश्वर्येण वर्धमानाः (शुद्धाः पूताः-भवत) दोषरहिताः पवित्रान्तःकरणा भवत ॥२॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - O travellers on the path of divinity, dedicated performers of yajna, as you go forward effacing the onset of death and living a long life of high order of happiness and virtue, may you be blest with wealth and noble progeny, may you be pure and sanctified at heart and in the soul.