मृत्यु-पद-योपन [शुद्ध-पूत - यज्ञिय ]
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र में वर्णित (मृत्योः पदम्) = मृत्यु के 'स्वार्थ व भोगमय' मार्ग को (योपयन्तः) = परे धकेलते हुए व अपने से दूर करते हुए (यदा एत) = जब चलते हैं तो (द्राघीयः) = अत्यन्त दीर्घ व (प्रतरं) = उत्कृष्ट (आयु:) = जीवन को (दधानाः) = धारण करते हुए होते हैं । दीर्घ व उत्कृष्ट जीवन को प्राप्त करने का मार्ग यही है कि हम देवयान से चलें, 'दान व ज्ञान' के मार्ग को अपनाएँ। [२] उत्कृष्ट जीवन का ही चित्रण करते हुए कहते हैं कि (प्रजया) = उत्तम सन्तान से तथा (धनेन) = धन से (आप्यायमानाः) = सब दिशाओं में उन्नति करते हुए (शुद्धा:) = शुद्ध अन्तःकरण वाले (पूताः) = यज्ञ व रोगों से शून्य शरीर वाले और (यज्ञियासः) = उत्तम कर्मों में प्रवृत्त (भवतः) = हो जाइये। सांसारिक जीवन में प्रजा व धन का स्थान स्पष्ट है धन के बिना संसार में एक कदम भी उठाना कठिन है । निर्धनता तो महान् पाप है । सन्तान भी प्रतिकूल होकर हमें समाज में अप्रतिष्ठा कराती है तो यह मरणान्तक कष्ट है। |
भावार्थभाषाः - भावार्थ- संसार में रहते हुए हम श्रेष्ठ सन्तान व शुद्ध पवित्र धन प्राप्त कर मृत्यु को दूर भगाते रहें ।