पदार्थान्वयभाषाः - [१] (पूषा) = पोषण करनेवाले प्रभु (इमाः सर्वाः आशाः) = इन सब दिशाओं को अनुवेद ठीक- ठीक रूप में जानते हैं । प्रभु से कुछ अज्ञात नहीं है । (सः) = वे प्रभु (अस्मान्) = हमें (अभयतमेन) = अत्यन्त निर्भयता के मार्ग से नेषत्-ले चलें । हमारे लिये जो भी मार्ग कल्याणकर है, प्रभु पूर्ण प्रज्ञ होने के नाते, हमें उस मार्ग से ही ले चलें । [२] वे प्रभु (स्वस्तिदा) = कल्याण को देनेवाले हैं । मार्गस्थ को (अवसाद) = कष्ट नहीं प्राप्त होता । प्रभु हमें मार्ग से ले चलेंगे तो हमारा कल्याण तो होगा ही । (आघृणिः) = वे प्रभु (सर्वतः) = ज्ञानरश्मियों से दीप्त हैं, (सर्ववीरः) = सम्पूर्ण शक्तियों वाले हैं। न तो प्रभु के ज्ञान में कमी है, ना ही उनकी शक्ति में । सर्वज्ञ व सर्वशक्तिमान् होने के नाते वे प्रभु (अप्रयुच्छन्) = किञ्चिन्मात्र भी प्रमाद न करते हुए (प्रजानन्) = हमारी स्थिति को पूर्ण रूप से समझते हुए (पुरः एतु) = हमारे आगे चलें, अर्थात् हमारे मार्गदर्शक हों। हमें प्रभु कृपा प्राप्त हो, हम प्रभु से उपेक्षित न हों।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- वे सर्वज्ञ सर्वशक्तिमान् प्रभु सब मार्गों को अच्छी प्रकार जानते हुए अभयतम मार्ग से हमें ले चलें ।