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अ॒हम॑स्मि सपत्न॒हेन्द्र॑ इ॒वारि॑ष्टो॒ अक्ष॑तः । अ॒धः स॒पत्ना॑ मे प॒दोरि॒मे सर्वे॑ अ॒भिष्ठि॑ताः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

aham asmi sapatnahendra ivāriṣṭo akṣataḥ | adhaḥ sapatnā me pador ime sarve abhiṣṭhitāḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

अ॒हम् । अ॒स्मि॒ । स॒प॒त्न॒ऽहा । इन्द्रः॑ऽइव । अरि॑ष्टः । अक्ष॑तः । अ॒धः । स॒ऽपत्नाः॑ । मे॒ । प॒दोः । इ॒मे । सर्वे॑ । अ॒भिऽस्थि॑ताः ॥ १०.१६६.२

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:166» मन्त्र:2 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:24» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:2


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अहं सपत्नहा) मैं शत्रुओं का हननकर्ता (इन्द्रः-इव) राजा (अरिष्टः) अहिंसित तथा (अक्षतः) क्षयरहित (अस्मि) मैं हूँ (इमे सर्वे) ये सब (अभिष्ठिताः) सम्मुख स्थित (सपत्नाः) विरोधी शत्रुजन (मे पदोः-अधः) मेरे पैरों के नीचे होवें ॥२॥
भावार्थभाषाः - राजा शत्रुओं का नाशक, अहिंसित और क्षयरहित हुआ सब शत्रुओं को अपने अधीन करनेवाला होना चाहिये ॥२॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

अरिष्ट- अक्षत

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (अहम्) = मैं (सपत्नहा) = सपत्नभूत काम-क्रोध आदि का विनष्ट करनेवाला (अस्मि) = हूँ | (इन्द्रः इव) = एक जितेन्द्रिय पुरुष की तरह (अरिष्टः) = वासनाओं से तो मैं हिंसित न होऊँ। तथा (अक्षतः) = शरीर में रोगों से किसी प्रकार की क्षतिवाला न होऊँ। [२] (इमे सर्वे) = ये सारे (अभिष्ठिता:) = चारों ओर ठहरे हुए (सपत्ना:) = शत्रु मे (पदोः अधः) = मेरे पाँवों के नीचे हों। मैं इन काम-क्रोध आदि सब ओर से आक्रमण करनेवाले शत्रुओं को पादाक्रान्त करनेवाला बनूँ । इनको कुचलकर ही मैं अरिष्ट व अक्षत हो सकता हूँ ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- मैं सपत्नों को नष्ट करके 'अहिंसित व अक्षत' होऊँ । ऋषिः - ऋषभो वैराजः शाक्वरो वा ॥
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (अहं सपत्नहा) अहं शत्रुहन्ता (इन्द्रः-इव) राजेव (अरिष्टः-अक्षतः) अहिंसितः क्षतरहितश्च (अस्मि) भवेयम् ‘लिङर्थे लेट्’ (इमे सर्वे-अभिष्ठिताः सपत्नाः) एते सर्वे सम्मुखं स्थिता विरोधिनः (मे पदोः-अधः) मम पादयोः “पद्दन्नो…” [अष्टा० ६।१।६१] इति पादस्य पदादेशः” नीचैर्भवेयुः ॥२॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - I am like Indra, destroyer of adversaries, unhurt, uninjured, and unbroken. All these rivals, adversaries and enemies ranged against me are under my foot.