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प्र॒त्यञ्च॑म॒र्कम॑नय॒ञ्छची॑भि॒रादित्स्व॒धामि॑षि॒रां पर्य॑पश्यन् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

pratyañcam arkam anayañ chacībhir ād it svadhām iṣirām pary apaśyan ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र॒त्यञ्च॑म् । अ॒र्कम् । अ॒न॒य॒न् । शची॑भिः । आत् । इत् । स्व॒धाम् । इ॒षि॒राम् । परि॑ । अ॒प॒श्य॒न् ॥ १०.१५७.५

ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:157» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:8» वर्ग:15» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:12» मन्त्र:5


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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शचीभिः) विद्वान् कर्मों से (अर्कम्) अर्चनीय राजा को (प्रत्यञ्चम्) प्रतिपूजा स्थान को (अनयन्) पहुँचाते हैं, तब (इषिराम्) इष्ट (स्वधाम्) स्वकीय धारण योग्य वृत्ति-भारी दक्षिणा (परि-अपश्यन्) परिप्राप्त करते हैं ॥५॥
भावार्थभाषाः - विद्वान् जन राजा को राजसूययज्ञ द्वारा राजपद पर प्रतिष्ठित कर देते हैं, तो उन्हें अभीष्ट पुष्कल स्थिर जीविका मिलनी चाहिए ॥५॥
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हरिशरण सिद्धान्तालंकार

इषिरा 'स्वधा'

पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्र के देव शचीभिः प्रज्ञापूर्वक कर्मों के द्वारा (प्रत्यञ्चम्) = उस अन्तः स्थित (अर्कम्) = उपास्य प्रभु को (अनयन्) = अपने प्रति प्राप्त कराते हैं। प्रज्ञापूर्वक कर्मों से ही प्रभु का सच्चा उपासन होता है । इन कर्मों से ही हम प्रभु को प्राप्त करते हैं । [२] (आत् इत्) = प्रभु को प्राप्त करने के बाद एकदम ये देव अपने अन्दर (इषिराम्) = [एषति to go, move] गतिशील (स्वधाम्) = आत्मधारण शक्ति को (पर्यपश्यन्) = देखते हैं । प्रभु को अपने हृदयों में स्थापित करने से इन्हें वह आत्मधारण शक्ति प्राप्त होती है, जो कि इन्हें सब प्राणियों के हितसाधन में निरन्तर प्रवृत्त रखती है 'सर्वभूत हिते रताः ' ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रज्ञापूर्वक कर्मों से प्रभु का उपासन होता है। प्रभु को हृदय में स्थापित करने से क्रियामय आत्मधारण शक्ति प्राप्त होती है। सम्पूर्ण सूक्त का भाव भी यही है कि शरीर, मन व मस्तिष्क को स्वस्थ रखते हुए हम प्रज्ञापूर्वक कर्मों में प्रवृत्त रहें। इस प्रकार प्रभु का स्तवन करते हुए हम अपने अन्दर शक्ति का अनुभव करें और सदा लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त रहें इन लोकहित के कार्यों में प्रवृत्त रहने के लिये चक्षु आदि इन्द्रियों का सशक्त बने रहना आवश्यक है । चक्षु आदि इन्द्रियों की शक्ति को स्थिरता के लिये सूर्यादि देवों की अनुकूलता आवश्यक होती है। इस अनुकूलता को सिद्ध करनेवाला 'चक्षुः सौर्य: ' अगले सूक्त का ऋषि है। उसकी प्रार्थना इस प्रकार है-
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ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (शचीभिः) विद्वांसः कर्मभिः (अर्कम्) अर्चनीयं राजानम् (प्रत्यञ्चम्-अनयन्) प्रतिपूजास्थानं नयन्ति, तदा (इषिरां स्वधाम्) इष्टां स्वकीयधारणयोग्यवृत्तिम् (परि-अपश्यन्) परि प्राप्नुवन्ति ॥५॥
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डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - When the Vishvedevas, divinities of nature and human nobilities, offer their songs of adoration in their best of yajnic homage higher and higher forward, then only they see and experience divine inspiration and invigoration descending to them step by step from divinity through nature to humanity.