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प्रेहि॒ प्रेहि॑ प॒थिभि॑: पू॒र्व्येभि॒र्यत्रा॑ न॒: पूर्वे॑ पि॒तर॑: परे॒युः । उ॒भा राजा॑ना स्व॒धया॒ मद॑न्ता य॒मं प॑श्यासि॒ वरु॑णं च दे॒वम् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

prehi prehi pathibhiḥ pūrvyebhir yatrā naḥ pūrve pitaraḥ pareyuḥ | ubhā rājānā svadhayā madantā yamam paśyāsi varuṇaṁ ca devam ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

प्र । इ॒हि॒ । प्र । इ॒हि॒ । प॒थिऽभिः॑ । पू॒र्व्येभिः॑ । यत्र॑ । नः॒ । पूर्वे॑ । पि॒तरः॑ । प॒रा॒ऽई॒युः । उ॒भा । राजा॑ना । स्व॒धया॑ । मद॑न्ता । य॒मम् । प॒श्या॒सि॒ । वरु॑णम् । च॒ । दे॒वम् ॥ १०.१४.७

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:14» मन्त्र:7 | अष्टक:7» अध्याय:6» वर्ग:15» मन्त्र:2 | मण्डल:10» अनुवाक:1» मन्त्र:7


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पूर्व्येभिः पथिभिः प्रेहि प्रेहि) पूर्वोत्पन्न बड़े लोगों के बनाये मर्यादित किये हुए जीवनयात्रा सम्बन्धी इष्टापूर्त्त आदि आचरणरूप मार्गों से हे जीव ! तू जीवनान्त को पुनः-पुनः या नित्य प्राप्त कर (यत्र नः पूर्वे पितरः परेयुः) जिन मार्गों में वर्त्तमान हुए हमारे पालक जन जीवनान्त आयु की पूर्णता को प्राप्त हुए हैं, (स्वधया मदन्ता-उभा राजाना यमं वरुणं च देवं पश्यासि) जल के द्वारा तुझे संतुष्ट करते हुए दोनों राजमान बड़ी सत्तावाले सर्वत्र व्याप्त सब पदार्थों को स्ववश करनेवाले अन्तकारी काल तथा जन्म के अधिष्ठाता नूतन उत्पत्ति के लिये सब को वरनेवाले आकाश में वर्तमान सूक्ष्म जलरूप वरुणदेव को तू देख। यह एक आन्तरिक विचाररूप उपदेश है ॥७॥
भावार्थभाषाः - जीव का आयु को पूर्ण करके मृत्युरूप अन्तकाल और फिर पुनर्जन्म के लिये मेघ के सूक्ष्म जलरूप वरुण का प्राप्त करना अनिवार्य है। अतः जीवन की अस्थिरता को ध्यान में रखते हुए उत्तम कर्ममार्गों पर चलना चाहिये ॥७॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

यम और वरुण संयम व निर्दोषता

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्रा) = जिस मार्ग पर (न:) = हमारे (पूर्वे) = अपना पूरण करनेवाले (पितरः) = रक्षक लोक (परेयुः) = उत्कृष्टता से चलते हैं उन्हीं (पूर्व्येभिः) = पूरण करने में उत्तम अर्थात् सब न्यूनताओं को दूर करनेवाले (पथिभिः) = मार्गों से (प्रेहि) = चल और इन्हीं मार्गों से ही (प्रेहि) = चल । हमें चाहिए यही कि हम अपने पितरों के उत्तम मार्ग पर ही चलने का प्रयत्न करें। [२] प्रभु जीव से कहते हैं कि तू अपने मार्गदर्शन के लिये यमं यम को (च) = और (वरुणं देवं) = वरुण देव को (पश्यासि) = देख । यम के जीवन की विशेषता 'जीवन का नियन्त्रण' है और 'वरुण' द्वेष का निवारण करनेवाला, द्वेषशून्य सब के प्रति प्रेमपूर्ण है । इनको देखने का अभिप्राय यह है कि हम भी नियन्त्रित जीवन वाले व द्वेषशुन्य बनें। [३] (उभा) = ये दोनों नियन्त्रित जीवन वाले तथा द्वेषशून्य व्यक्ति (राजाना) = चमकनेवाले होते हैं [ राज् दीप्तौ]। इनका जीवन दीप्त होता है, और (स्वधया मदन्ता) = [ स्व + धा] आत्मतत्त्व के धारण से हर्ष का अनुभव करते हैं। 'यम' बनकर ये पूर्ण स्वस्थ होते हैं और स्वास्थ्य की दीप्ति से चमकते हैं तथा 'वरुण' व निर्दोष होने के कारण ये अपने हृदय में आत्मप्रकाश को देखते हैं और इस प्रकार आत्मतत्त्व के धारण से आनन्द का अनुभव करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारा मार्ग वही हो जो यम व वरुण का है। संयम हमें स्वास्थ्य की दीति दें,और निर्देषता हमें प्रभु का प्रकाश देखने के योग्य बनाकर आनन्दित करे । यम हमारे शरीरों को पवित्र करे और वरुण मनों को । संयमी बनकर हम व्याधियों से बचें। और वरुण बनकर आधियों से ऊपर उठें।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (पूर्व्येभिः पथिभिः प्रेहि प्रेहि) पूर्वोत्पन्नबृहज्जनैः कृतैर्मयोदितैर्जीवनमार्गैरिष्टापूर्त्तादिभिराचरणैर्हे जीव ! त्वं प्रेहि प्रेहि, जीवनान्तं गच्छ गच्छ पुनः पुनर्गच्छ नित्यं गच्छेत्यर्थः “नित्यवीप्सयोः” [अष्टा०८।१।४] (यत्र नः पूर्वे पितरः परेयुः) येषु वर्तमाना अस्माकं पूर्वे पितरः-पालकजनाः परागता जीवनान्तं प्राप्ताः सन्ति (स्वधया मदन्ता-उभा राजाना यमं वरुणं च देवं पश्यामि) उदकेन त्वां मादयन्तौ तर्पयन्तौ “हर वैवस्वतोदकम्” [कठो०१।७] इति चोक्तम्। ‘मदन्ता-इत्यत्रान्तर्गतो णिजर्थः’ “स्वधा-उदकनाम” [निघं०१।१२] उभा राजानोभौ राजमानौ महत्सत्ताकौ सर्वत्र व्याप्तौ, यमम्-यमनशीलं सर्वान् पदार्थान् स्वायत्तीकर्तारमन्तकालं तथा वरुणं जन्मनोऽधिष्ठातृदेवं नूतनोत्पादनाय सर्वपदार्थवरुणशीलमाकाशे वर्तमानं मेघस्थं सूक्ष्मजलं देवं पश्यासि-पश्येः “लिङर्थे लेट्” [अष्टा०३।४।७] “आपो यच्च वृत्वाऽतिष्ठंस्तद्वरणोऽभवत्तं वा एतं वरुणं सन्तं वरुण इत्याचक्षते परोक्षेण” [गोपथ १।७] ॥७॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Go forward, O man, move on by the ancient paths of life universally carved for you, by which the forefathers too went forward to complete their course of life. Intelligent you are and you see both the divine sun and the divine night, the all comprehending time and the spirit of cosmic judgement, the solar region and the cosmic waters, divine, brilliant, ruling mighty in terms of their own powers and agreeable by your service to them and to the environment.$All