यम और वरुण संयम व निर्दोषता
पदार्थान्वयभाषाः - [१] (यत्रा) = जिस मार्ग पर (न:) = हमारे (पूर्वे) = अपना पूरण करनेवाले (पितरः) = रक्षक लोक (परेयुः) = उत्कृष्टता से चलते हैं उन्हीं (पूर्व्येभिः) = पूरण करने में उत्तम अर्थात् सब न्यूनताओं को दूर करनेवाले (पथिभिः) = मार्गों से (प्रेहि) = चल और इन्हीं मार्गों से ही (प्रेहि) = चल । हमें चाहिए यही कि हम अपने पितरों के उत्तम मार्ग पर ही चलने का प्रयत्न करें। [२] प्रभु जीव से कहते हैं कि तू अपने मार्गदर्शन के लिये यमं यम को (च) = और (वरुणं देवं) = वरुण देव को (पश्यासि) = देख । यम के जीवन की विशेषता 'जीवन का नियन्त्रण' है और 'वरुण' द्वेष का निवारण करनेवाला, द्वेषशून्य सब के प्रति प्रेमपूर्ण है । इनको देखने का अभिप्राय यह है कि हम भी नियन्त्रित जीवन वाले व द्वेषशुन्य बनें। [३] (उभा) = ये दोनों नियन्त्रित जीवन वाले तथा द्वेषशून्य व्यक्ति (राजाना) = चमकनेवाले होते हैं [ राज् दीप्तौ]। इनका जीवन दीप्त होता है, और (स्वधया मदन्ता) = [ स्व + धा] आत्मतत्त्व के धारण से हर्ष का अनुभव करते हैं। 'यम' बनकर ये पूर्ण स्वस्थ होते हैं और स्वास्थ्य की दीप्ति से चमकते हैं तथा 'वरुण' व निर्दोष होने के कारण ये अपने हृदय में आत्मप्रकाश को देखते हैं और इस प्रकार आत्मतत्त्व के धारण से आनन्द का अनुभव करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हमारा मार्ग वही हो जो यम व वरुण का है। संयम हमें स्वास्थ्य की दीति दें,और निर्देषता हमें प्रभु का प्रकाश देखने के योग्य बनाकर आनन्दित करे । यम हमारे शरीरों को पवित्र करे और वरुण मनों को । संयमी बनकर हम व्याधियों से बचें। और वरुण बनकर आधियों से ऊपर उठें।