पदार्थान्वयभाषाः - [१] गत मन्त्रों में वर्णित काम-क्रोध (उरूणसौ) = बड़ी नाक वाले हैं। सेवन से ये बढ़ते ही जाते हैं। (अ-सु-तृपौ) = ये कभी अच्छी तरह तृप्त हो जाएँ, सो बात नहीं है। 'भूय एवाभिवर्धते’=ये तो उत्तरोत्तर बढ़ते ही चलते हैं। (उदुम्बलौ) [उद् बलौ] = अत्यन्त प्रबल हैं। इनको जीतना सुगम नहीं है। और अपराजित हुए हुए ये (यमस्य दूतौ) = यम के दूत हैं, हमें मृत्यु के समीप ले जाते हैं। ये दोनों दूत (जना अनु चरतः) = सदा मनुष्यों के पीछे चलते हैं । अर्थात् ये हमारे अन्दर स्वाभाविक रूप से रखे हुए हैं । [२] अब यदि ये प्रबल हो जाएँ तो ये हमें समाप्त कर देते हैं, और यदि हम प्रबल बनकर इनको अपने वश में रखें तो ये हमारे सेवक होते हैं और हमारा कल्याण करनेवाले बन जाते हैं। प्रबल जीवित रूप में ये हमें सोने की [gold] तरह समाप्त करनेवाले होते हैं। तथा भस्मीभूत हुए हुए ये स्वर्णभस्म की तरह हमारे जीवन का कारण बनते हैं । सो हम इन्हें ज्ञानचक्षु से भस्मीभूत करनेवाले हों जिससे (तौ) = ये काम व क्रोध (अस्मभ्यम्) = हमारे लिये (पुनः) = फिर (अद्य) = आज (इह) = यहाँ (भद्रं असुम्) = शुभ जीवन को (दाताम्) = प्राप्त कराएँ और हम (दृशये सूर्याय) = दीर्घकाल तक सूर्य दर्शन करनेवाले व दीर्घजीवी हो सकें। गत मन्त्र के अनुसार स्वस्ति व अनमीव को प्राप्त करके पूर्ण शतवर्ष के जीवन वाले हों ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- काम-क्रोध अत्यन्त प्रबल हैं, परन्तु हमारे लिये तो ये वशीभूत हुए हुए भद्र जीवन को दें जिससे हम दीर्घकाल तक सूर्य दर्शन करनेवाले बनें।