पदार्थान्वयभाषाः - [१] शरीर में 'रोग' हमारे सपत्न हैं, मन में 'वासनाएँ'। (ये) = जो भी (न) = हमारे (सपत्ना:) = शत्रु हैं, (ते) = वे (अपभवन्तु) = हमारे से दूर हों । (इन्द्राग्निभ्याम्) = बल व प्रकाश के द्वारा ['इन्द्र' बल का प्रतीक है, 'अग्नि' प्रकाश का] हम उन सब सपत्नों को (अवबाधामहे) = अपने से दूर करते हैं । इन्द्र के द्वारा रोगों को तथा अग्नि के द्वारा वासनाओं को हम पराजित करते हैं । जितेन्द्रिय के समीप रोग नहीं आते, ज्ञान के प्रकाशवाला वासनाओं से बचा रहता है, इस ज्ञानाग्नि में वासनाएँ भस्म हो जाती हैं । [२] (वसवः) = शरीर में अपने निवास को उत्तम बनानेवाले, प्रकृति के पूर्ण ज्ञानी विद्वान्, (रुद्रा:) = वासनाओं को आक्रान्त करनेवाले [रोरूयमाण [द्रवति]] जीव के रहस्य को समझनेवाले विद्वान् तथा (आदित्याः) = सब अच्छाइयों का आदान करनेवाले सूर्यसम ज्योति ब्रह्म के ज्ञाता पुरुष (मा) = मुझे (अक्रन्) = बनाएँ कैसा ? [क] उपरिस्पृशम् ऊपर और ऊपर स्पर्श करनेवाला, हीन भावनाओं से ऊपर उठनेवाला, [ख] (उग्रम्) = तेजस्वी- शत्रुओं के लिए भयंकर, [ग] (चेत्तारम्) = चेतनावाला तथा [घ] (अधिराजम्) = मन, बुद्धि व इन्द्रियों का शासक। ऐसा बनकर ही तो मैं आदर्श मानव हो सकूँगा ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम इन्द्र व अग्नि तत्त्व का अपने में विकास करें। उत्कृष्ट, तेजस्वी, ज्ञानी व आत्मशासक बनें । सूक्त का प्रारम्भ 'चतुर्दिग् विजय' से होता है [१] और समाप्ति पर 'अधिराट्' बनने का उल्लेख है [२] यह अधिराट् 'परमेष्ठी' सर्वोच्च स्थान में स्थित होता है, यह 'प्रजापति' प्रजा को रक्षण के कार्यों में तत्पर होता है। अगले सूक्त का यही ऋषि है । 'परमेष्ठी प्रजापति' प्रभु हैं, इनको जाननेवाला भी इसी नाम से कहलाता है। यह प्रभु के द्वारा होनेवाली इस सृष्टि का ध्यान करते हुए कहते है-