क्रियाशीलता व ज्ञान की उपासना
पदार्थान्वयभाषाः - [१] गतमन्त्र के अनुसार प्रभु के रक्षण में चलनेवाले (देवाः) = देववृत्ति के लोग (यस्मिन्) = जिस समय प्रभु की गोद में रहते हुए, (विदथे) = ज्ञानयज्ञों में (मादयन्ते) = हर्ष का अनुभव करते हैं, अर्थात् सदा ज्ञान- प्रधान जीवन बिताते हैं । [२] (विवस्वतः) = सूर्य के (सदने) = निवास स्थान द्युलोक में (धारयन्ते) = अपना धारण करते हैं। 'द्युलोक' शरीर में मस्तिष्क है, सो जो लोग अपने को मस्तिष्क में धारित करते हैं, अर्थात् हृदय-प्रधान व भावुक वृत्ति के नहीं होते, समझदार = [sensible] तो होते हैं परन्तु बहुत महसूस कर जानेवाले - [sensitive] नहीं हो जाते । [३] (सूर्ये) = 'सूर्ये: चक्षुर्भूत्वा० अपनी आँखों में (ज्योतिः अदधुः) = प्रकाश को धारण करते हैं अर्थात् इनकी आँखों में सदा वह चमक होती है जो कि इनके मानस प्रसाद व उत्साह का संकेत करती है। [४] (मासि) = [चन्द्रमा मनो भूत्वा०], मास्=[the moon] अपने मनों में अक्तून् प्रकाश की किरणों को धारण करते हैं, अर्थात् हृदयस्थ प्रभु के प्रकाश को देखते हैं। [५] तो इस लोक-समाज में (अजस्त्रा) = [अ+जस्= छोड़ना] कर्मों को सदा करनेवाले पति-पत्नी (द्योतनिम्) = ज्ञान की ज्योति का (परिचरतः) = सदा उपासन करते हैं। अर्थात् आदर्श लोकों के घरों में 'क्रियाशीलता व ज्ञान की उपासना' निरन्तर चलती है ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- हम ज्ञानयज्ञों में आनन्द लें, सदा समझदारी से चलें, हमारी आँखों में ज्योति मन में आह्लाद। क्रियाशील हों व ज्ञान के उपासक ।