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स इद॒ग्निः कण्व॑तम॒: कण्व॑सखा॒र्यः पर॒स्यान्त॑रस्य॒ तरु॑षः । अ॒ग्निः पा॑तु गृण॒तो अ॒ग्निः सू॒रीन॒ग्निर्द॑दातु॒ तेषा॒मवो॑ नः ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

sa id agniḥ kaṇvatamaḥ kaṇvasakhāryaḥ parasyāntarasya taruṣaḥ | agniḥ pātu gṛṇato agniḥ sūrīn agnir dadātu teṣām avo naḥ ||

मन्त्र उच्चारण
पद पाठ

सः । इत् । अ॒ग्निः । कण्व॑ऽतमः । कण्व॑ऽसखा । अ॒र्यः । पर॑स्य । अन्त॑रस्य । तरु॑षः । अ॒ग्निः । पा॒तु॒ । गृ॒ण॒तः । अ॒ग्निः । सू॒रीन् । अ॒ग्निः । द॒दा॒तु॒ । तेषा॑म् । अवः॑ । नः॒ ॥ १०.११५.५

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ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:115» मन्त्र:5 | अष्टक:8» अध्याय:6» वर्ग:18» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:10» मन्त्र:5


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः-इत्) वह ही (अग्निः) अग्रणेता परमात्मा (कण्वतमः) अत्यन्त मेधावी (कण्वसखा) तथा मेधाविजनों का मित्र (अर्यः) स्वामी है (अग्निः परस्य) परमात्मा दूसरे के निमित्त किये पाप का (अन्तरस्य) अपने अन्दर के स्वविषयक पाप का (तरुषः) हिंसक नाशक है (अग्निः) परमात्मा (गृणतः पातु) स्तुति करनेवाले जनों की रक्षा करता है (अग्निः) परमात्मा (तेषाम्) उन (नः) हम (सूरीन्) स्तुति करनेवालों को (अवः) रक्षण (ददातु) देता है ॥५॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा अत्यन्त मेधावी स्तुति करनेवालों का मित्र और स्वामी है। वह दूसरे के प्रति किये हुए अपने अन्दर के पाप को नष्ट करता है और स्तुति करनेवाले की रक्षा करता है ॥५॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

कण्वतमः - कण्वसखा

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह (अग्निः) = अग्रेणी प्रभु (इत्) = ही (कण्वतमः) = अत्यन्त मेधावी हैं, (कण्वसखा) = मेधावियों के मित्र हैं, मेधावी मित्रोंवाले हैं। मेधावी पुरुष ही वस्तुतः प्रभु का मित्र है । (अर्यः) = वे प्रभु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं । (परस्य) = बाह्य तथा (अन्तरस्य) = अन्दर के शत्रुओं से वे प्रभु (तरुषः) = तरानेवाले हैं। [२] (अग्निः) = ये अग्रेणी प्रभु (गृणतः पातु) = स्तुति करनेवालों का रक्षण करते हैं। (अग्निः) वे अग्रेणी प्रभु (सूरीम्) = विद्वानों का रक्षण करते हैं । (अग्निः) = वे अग्रेणी प्रभु (तेषाम्) = उन स्तोताओं व ज्ञानियों के (अवः) = रक्षण को (नः) = हमारे लिए (ददातु) = देनेवाले हों। हम भी स्तोता व ज्ञानी बनकर प्रभु के रक्षण के पात्र हों। अथवा ये प्रभु इन स्तोताओं व ज्ञानियों के द्वारा हमारा रक्षण करें। प्रभु इन स्तोताओं व ज्ञानियों का रक्षण करते हैं । इन स्तोताओं व ज्ञानियों के द्वारा वे अन्यों का रक्षण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मेधावी बनकर मैं प्रभु का प्रिय बनूँ । वे प्रभु हमारे बाह्य व आन्तर शत्रुओं से हमारा रक्षण करते हैं । स्तोता व सूरि प्रभु रक्षण के पात्र होते हैं। इनके द्वारा प्रभु अन्य लोगों का रक्षण करते हैं ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (सः-इत्-अग्निः कण्वतमः-कण्वसखा-अर्यः) सोऽग्निरग्रणेता परमात्माऽतिशयेन-मेधावी “कण्वो मेधाविनाम” [निघ० ३।१५] तथा मेधाविनः-सखायो यस्य तथाभूतः सोऽर्यः स्वामी च सर्वेषां (अग्निः परस्य-अन्तरस्य तरुषः) परमात्मा परस्मिन् कृतस्य पापस्य स्वान्तरे कृते स्वविषयकपापस्य हिंसको नाशकोऽस्ति “तरुष्यति हिंसाकर्मा” [निरु० ५।२१] (अग्निः) परमात्मा (गृणतः पातु) स्तुतिं कुर्वतो जनान् रक्षति, लुडर्थे लोट् (अग्निः) परमात्मा (तेषां नः सूरीन्-अवः-ददातु) तेषां तान्-अस्मान् स्तुतिकर्तॄन् रक्षणं ददाति “सूरिः स्तोतृनाम” [निघ० ३।१६] ॥५॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - That Agni, lord and leader of life, wisest pioneer and comrade of the warring wise, is the saviour giver of success and fulfilment to devotees far and near across difficulties within and outside. May Agni protect and promote the celebrants and the brave and give us the advantage of their protection and advancement.