पदार्थान्वयभाषाः - [१] (सः) = वह (अग्निः) = अग्रेणी प्रभु (इत्) = ही (कण्वतमः) = अत्यन्त मेधावी हैं, (कण्वसखा) = मेधावियों के मित्र हैं, मेधावी मित्रोंवाले हैं। मेधावी पुरुष ही वस्तुतः प्रभु का मित्र है । (अर्यः) = वे प्रभु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं । (परस्य) = बाह्य तथा (अन्तरस्य) = अन्दर के शत्रुओं से वे प्रभु (तरुषः) = तरानेवाले हैं। [२] (अग्निः) = ये अग्रेणी प्रभु (गृणतः पातु) = स्तुति करनेवालों का रक्षण करते हैं। (अग्निः) वे अग्रेणी प्रभु (सूरीम्) = विद्वानों का रक्षण करते हैं । (अग्निः) = वे अग्रेणी प्रभु (तेषाम्) = उन स्तोताओं व ज्ञानियों के (अवः) = रक्षण को (नः) = हमारे लिए (ददातु) = देनेवाले हों। हम भी स्तोता व ज्ञानी बनकर प्रभु के रक्षण के पात्र हों। अथवा ये प्रभु इन स्तोताओं व ज्ञानियों के द्वारा हमारा रक्षण करें। प्रभु इन स्तोताओं व ज्ञानियों का रक्षण करते हैं । इन स्तोताओं व ज्ञानियों के द्वारा वे अन्यों का रक्षण करते हैं।
भावार्थभाषाः - भावार्थ - मेधावी बनकर मैं प्रभु का प्रिय बनूँ । वे प्रभु हमारे बाह्य व आन्तर शत्रुओं से हमारा रक्षण करते हैं । स्तोता व सूरि प्रभु रक्षण के पात्र होते हैं। इनके द्वारा प्रभु अन्य लोगों का रक्षण करते हैं ।