वांछित मन्त्र चुनें
642 बार पढ़ा गया

उ॒भे धुरौ॒ वह्नि॑रा॒पिब्द॑मानो॒ऽन्तर्योने॑व चरति द्वि॒जानि॑: । वन॒स्पतिं॒ वन॒ आस्था॑पयध्वं॒ नि षू द॑धिध्व॒मख॑नन्त॒ उत्स॑म् ॥

अंग्रेज़ी लिप्यंतरण

ubhe dhurau vahnir āpibdamāno ntar yoneva carati dvijāniḥ | vanaspatiṁ vana āsthāpayadhvaṁ ni ṣū dadhidhvam akhananta utsam ||

पद पाठ

उ॒भे इति॑ । धुरौ॑ । वह्निः॑ । आ॒ऽपिब्द॑मानः । अ॒न्तः । योना॑ऽइव । च॒र॒ति॒ । द्वि॒ऽजानिः॑ । वन॒स्पति॑म् । वने॑ । आ । अ॒स्था॒प॒य॒ध्व॒म् । नि । सु । द॒धि॒ध्व॒म् । अख॑नन्तः । उत्स॑म् ॥ १०.१०१.११

642 बार पढ़ा गया
ऋग्वेद » मण्डल:10» सूक्त:101» मन्त्र:11 | अष्टक:8» अध्याय:5» वर्ग:19» मन्त्र:5 | मण्डल:10» अनुवाक:9» मन्त्र:11


ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उभे धुरौ) दोनों संसार और मोक्ष के आनन्दरस को (आपिब्दमानः) भलीभाँति पिलानेवाला-प्राप्त करानेवाला (वह्निः) वहन करनेवाला परमात्मा (द्विजानि) दोनों संसार मोक्ष में प्रसिद्ध हुआ (योना-इव) हृदय के अन्दर (चरति) विचरता है-प्राप्त होता है (वनस्पतिम्) वननीय आत्मा के पालक परमात्मा को (वने) वननीय अपने आत्मा में (नि-सु-आ-अस्थापयध्वम्) नियमरूप से भलीभाँति धारण करो (उत्सम्-अखनन्तः) पुनः आनन्दरस को उद्घाटित करो ॥११॥
भावार्थभाषाः - परमात्मा संसार और मोक्षधाम दोनों का अधिनायक स्वामी है, उसकी स्तुति प्रार्थना और उपासना करने से संसार का सच्चा सुख और मोक्ष का आनन्द प्राप्त होता है तथा अपने आत्मा का वननीय आश्रय है, हृदय में साक्षात् होनेवाला है ॥११॥

हरिशरण सिद्धान्तालंकार

उत्स - खनन

पदार्थान्वयभाषाः - [१] (उभे धुरौ) = दोनों धुराओं का (वह्निः) = वहन करनेवाला, इहलोक व परलोक के अभ्युदय व निःश्रेयस दोनों को प्राप्त करनेवाला, (आपिब्दमानः) = [पिब्दनाः पेष्टुमर्हाणि शत्रुमैनानि द० ६। ४६।६ पर] वासनारूप शत्रुओं का पेषण करता हुआ (द्विजानिः) = सरस्वती व लक्ष्मीरूप दो पत्नियोंवाला [श्रीश्च ते लक्ष्मीश्च पत्न्यौ० ] अथवा ब्रह्म व क्षत्र - ज्ञान और बल दोनों का विकास करनेवाला (अन्त: योना इव) = उस सबके उत्पत्ति - स्थान ब्रह्म में घर की तरह (चरति) = विचरण करता है । [२] (वनस्पतिम्) = [वनस्=loreliness, glory, wealth] सब सौन्दर्यों यशों व धनों के स्वामी उस प्रभु को (वने) = उपासना के होने पर (आस्थापयध्वम्) = अपने हृदय मन्दिर में स्थापित करो, (नि सुदधिध्वम्) = निश्चय से उस प्रभु को अपने में धारित करो। प्रभु के भावन को हृदय में सदा धारण करो। ऐसा करनेवाले ही (उत्सम् अखनन्त) = अपने अन्दर आनन्द के स्रोत को खोदने वाले होते हैं ।
भावार्थभाषाः - भावार्थ- प्रभु का उपासक ही अवर्णनीय आनन्द का अनुभव करता है ।

ब्रह्ममुनि

पदार्थान्वयभाषाः - (उभे धुरौ) उभौ संसारमोक्षानन्दरसौ (आपिब्दमानः) समन्तात् पिब्दमानः पाययमानः-प्रापयमाणः “पृषोदरादित्वादिष्टसिद्धिः” (वह्निः) वाहकः परमात्मा (द्विजानिः) द्वयोः संसारमोक्षयोः प्रसिद्धमानः (योना-इव) हृदयेऽन्तः-“इवोऽपि दृश्यते पदपूरणः” (चरति) विचरति (वनस्पतिं वने नि सु-आ-अस्थापयध्वम्) तं वननीयस्यात्मनः पतिं पालकं परमात्मानं वने वननीयं स्वात्मनि नियतं सुष्ठु धारयत (उत्सम्-अखनन्तः) ततः-आनन्दरसं खनन्तः-खनन्हेतोः ॥११॥

डॉ. तुलसी राम

पदार्थान्वयभाषाः - Bearing two poles of life, the mind, like a chariot horse, goes voluble flying like a bird over the sky. O yajaka, place the fire amid the samits, dig into depths of the soul and hold on there.